अल्मोड़ा: सरकार का ऐतिहासिक कदम, मेडिकल कॉलेजों में अब स्वास्थ्य सेवाओं का ‘मानवीय चेहरा’ बनेंगे सोशल वेलफेयर

अल्मोड़ा से जुड़ी खबर सामने आई है। उत्तराखंड सरकार ने राज्य के राजकीय मेडिकल कॉलेजों में स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक संवेदनशील और पेशेवर बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया है।

यह खास कदम

शासन ने ‘मेडिकल सोशल वेलफेयर ऑफिसर’ संवर्ग के लोक कल्याणकारी स्वरूप को विस्तार देते हुए उनके नए कार्य एवं उत्तरदायित्व (Job Description) निर्धारित कर दिए हैं। अब यह संवर्ग न केवल मरीजों की मदद करेगा, बल्कि चिकित्सा संस्थानों में प्रशासकीय और नीति-निर्धारक टीम के सक्रिय सदस्य के रूप में भी भूमिका निभाएगा।

प्रबंधन और नीति-निर्धारण में अहम भूमिका

सचिव सचिन कुर्वे द्वारा जारी आदेश के अनुसार,  संवर्ग को अब उच्च-स्तरीय प्रबंधकीय जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। ये अधिकारी चिकित्सा संस्थानों में केवल सहायक नहीं, बल्कि प्रशासकीय टीम के सक्रिय सदस्य होंगे, जो स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने के लिए डेटा विश्लेषण और नीतिगत फीडबैक प्रदान करेंगे। शासन द्वारा जारी जॉब चार्ट के अनुसार ये अधिकारी मेडिकल कॉलेजों में विभिन्न योजनाओं के संचालन और कार्यों के सुपरविजन (पर्यवेक्षण) के लिए उत्तरदायी होंगे। संस्थानों के सुचारू प्रबंधन में उनकी भूमिका एक ‘एडमिनिस्ट्रेटिव पिलर’ की होगी।

मास्टर ट्रेनर्स के रूप में नई पहचान

यह संवर्ग मेडिकल, पैरामेडिकल और नर्सिंग छात्रों के लिए ‘मास्टर ट्रेनर’ की भूमिका निभाएगा। वे भविष्य के डॉक्टरों को ‘फैमिली एडॉप्शन प्रोग्राम’ (FAP) के तहत सामाजिक और सामुदायिक चिकित्सा के व्यावहारिक गुर सिखाएंगे। अस्पताल प्रशासन के साथ मिलकर स्वास्थ्य नीतियों के डिजाइन, मूल्यांकन और कार्यान्वयन में ये अधिकारी डेटा-आधारित इनपुट देंगे, जिससे सरकारी योजनाओं को अधिक जन-केंद्रित बनाया जा सके। साथ ही आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का लाभ पात्रों तक पहुँचाने के साथ-साथ गंभीर रोगों (कैंसर, टीबी, एचआईवी) से जूझ रहे मरीजों के लिए परामर्श और पुनर्वास का नेतृत्व करेंगे।

अस्पताल और समाज के बीच सेतु

मरीजों के डिस्चार्ज के बाद फॉलो-अप और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के माध्यम से अस्पताल की सेवाओं को गांव की दहलीज तक ले जाने की कमान इनके हाथों में होगी। इस नई व्यवस्था से मेडिकल कॉलेजों की कार्यप्रणाली अधिक व्यवस्थित और मरीज-केंद्रित होगी। शासन का मानना है कि इस संवर्ग की सक्रियता से अस्पतालों में आने वाले गरीब और असहाय मरीजों को जटिल प्रक्रियाओं से मुक्ति मिलेगी और उन्हें एक ही छत के नीचे इलाज, आर्थिक सहायता और सही दिशा-निर्देश प्राप्त होंगे।