अल्मोड़ा से जुड़ी खबर सामने आई है। अल्मोड़ा में मेडिकल कालेज के जनरल मेडिसिन विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक डा. वेदांत शर्मा ने कुमाऊं क्षेत्र में 100 से अधिक सांप के डसने से अस्पताल आए मरीजों पर शोध किया है।
शोध में खुलासा
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जिसमें उन्होंने शोध कर कई खुलासे भी किए हैं। जिस पर उन्होंने बताया कि केवल पांच प्रतिशत सांप ही जहरीले होते हैं, जबकि 95 प्रतिशत सांप गैर-जहरीले होते हैं। कई बार सांप के डसने से नहीं भय से ही लोगों की मौत हो जाती है। बताया कि 65 प्रतिशत सांप के डसने के मामले मई से अगस्त के बीच सामने आए हैं। 48 प्रतिशत मामलों में घटना देर शाम सात बजे से सुबह छह बजे तक के है। अस्पताल पहुंचे केवल छह प्रतिशत लोगों की ही मौत हुई। जिसमें अंधविश्वास और डर के कारण भी मरने वालों की संख्या में बढ़ोतरी रहती है। उन्होंने बताया कि मरीजों पर किए अध्ययन में पाया गया कि सांप डसने के अधिकतर मामलों में पीड़ित की उम्र 21 से 30 वर्ष के बीच थी। इनमें पुरुषों की संख्या 59 और महिलाओं की 41 रही।
अध्ययन में सामने आई यह बात
साथ ही अध्ययन से स्पष्ट है कि समय पर इलाज और एएसवी उपलब्धता से सांप के काटने से होने वाली मृत्यु और गंभीरता को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
◻️◻️सांप डसने के मामले में मजदूरों 23 प्रतिशत और 20 प्रतिशत कृषक थे।
◾◾मैदान क्षेत्रों में 66 जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में केवल 33 प्रतिशत मामले सामने आए।
◻️◻️60 प्रतिशत मरीजों ने काटे जाने के एक से चार घंटे के भीतर अस्पताल पहुंचकर इलाज कराया।
◾◾64 प्रतिशत मामलों में सांप ने निचले अंग पर डसा था। 45 प्रतिशत मामलों में सांप की पहचान नहीं हो पाई। जबकि 37 प्रतिशत विषैले वाइपर और 11 प्रतिशत मामलों में कोबारा शामिल था।
◻️◻️84 प्रतिशत सांप के डसने के मामलों में तेज दर्द और शरीर पर दांत के निशान दिखे।
◾◾17 प्रतिशत मरीजों को सर्जरी की जरूरत पड़ी। वहीं 16 प्रतिशत आईसीयू में भर्ती हुए और 90 प्रतिशत मरीज इससे ठीक हुए।