October 22, 2021

अन्तरिक्ष में गामा किरण विस्फ़ोट को विश्लेषण करने वाले खगोलविदों में भारतीय खगोलविद भी शामिल

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खगोलविदों के एक समूह ने उच्च-ऊर्जा विकिरण के एक बहुत ही कम अवधि के ऐसे शक्तिशाली विस्फोट का पता लगाया है जो लगभग एक सेकंड तक हुआ और हमारे ब्रह्मांड की वर्तमान आयु की लगभग आधी दूरी से पृथ्वी की ओर दौड़ रहा था। सुदूर अंतरिक्ष में एक विशाल तारे की मृत्यु के कारण हुआ यह सबसे छोटा गामा-रे विस्फोट (जीआरबी) 26 अगस्त, 2020 को एनएएसए (नासा) के फर्मी गामा-रे स्पेस टेलीस्कोप द्वारा देखा गया था और यह जैसे रिकॉर्ड बुक के लिए ही निकला थाI   

बड़े सितारों की मृत्यु के समय लंबे समय तक हुए विस्फोट का निरीक्षण करते हैं

जीआरबी ब्रह्मांड की सबसे शक्तिशाली घटनाएं हैं, जिनका पता अरबों प्रकाश-वर्षों में ही लग सकता है। खगोलविद उन्हें दो सेकंड से अधिक या कम समय तक चलने के आधार पर लंबे या छोटे के रूप में वर्गीकृत करते हैं। वे बड़े सितारों की मृत्यु के समय लंबे समय तक हुए विस्फोट का निरीक्षण करते हैं, जबकि छोटे विस्फोट को एक अलग परिदृश्य से जोड़ा गया है।

मरता हुआ तारा शॉर्ट बर्स्ट भी उत्पन्न कर सकता है

      इस लघु अवधि में गामा रे बर्स्ट की पहचान करने वाले विश्व भर के वैज्ञानिकों के समूह में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के एक संस्थान, आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज (एआरआईईएस) के डॉ. शशि भूषण पांडे सहित भारत के कई अन्य वैज्ञानिक संस्थान भी शामिल हैं। इन भारतीय संस्थानों ने पहली बार यह दिखाया कि एक मरता हुआ तारा शॉर्ट बर्स्ट भी उत्पन्न कर सकता है। भारत की ओर से द इंटर-यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स, (आईयूसीएए) पुणे, नेशनल सेंटर फॉर रेडियो एस्ट्रोफिजिक्स – टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, (एनसीआरए) पुणे और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मुंबई ने भी इस काम में भाग लिया।   इस घटना का विश्लेषण करते हुए डॉ. पांडेय ने समझाया की “इस तरह की खोज ने गामा-किरणों के विस्फोट से संबंधित लंबे समय से चली आ रही जिज्ञासाओं को हल करने में मदद की है। साथ ही, यह अध्ययन संख्या घनत्व को बेहतर ढंग से सीमित करने के लिए ऐसी सभी ज्ञात घटनाओं का पुन: विश्लेषण करने के लिए भी प्रेरित करता है।”

जब इनमें से एक प्रवाह  लगभग सीधे पृथ्वी की ओर जाने का संकेत दे देता है

वैज्ञानिकों का कहना है कि जब सूर्य से बहुत अधिक विशाल तारे का ईंधन समाप्त हो जाता है, तो उसका केन्द्रीय भाग (कोर) अचानक ढह जाता है और एक कृष्ण विवर (ब्लैक होल) बन जाता है। जैसे ही पदार्थ ब्लैक होल की ओर घूमता है, उसमें से कुछ अंश दो शक्तिशाली धाराओं (जेट) के रूप में बाहर की ओर निकल जाते हैं और जो फिर विपरीत दिशाओं में प्रकाश की गति से लगभग बाहर की ओर भागते हैं। खगोलविद केवल जीआरबी का ही पता तब लगा पाते हैं जब इनमें से एक प्रवाह  लगभग सीधे पृथ्वी की ओर जाने का संकेत दे देता है।तारे के भीतर से प्रस्फुटित प्रत्येक धारा (जेट) से गामा किरणों का एक स्पंदन उत्पन्न होता है– जो प्रकाश का ऐसा उच्चतम-ऊर्जा रूप है जो कई मिनटों तक चल सकता है। विस्फोट के बाद विखंडित तारा फिर तेजी से एक सुपरनोवा के रूप में फैलता है। दूसरी ओर, लघु जीआरबी तब बनते हैं जब संघटित (कॉम्पैक्ट) वस्तुओं के जोड़े- जैसे न्यूट्रॉन तारे, जो तारों के टूटने के दौरान भी बनते हैं- अरबों वर्षों में अंदर की ओर सर्पिल रूप में घूर्णन करते रहते हैं और आपस में टकराते हैं।

छोटे जीआरबी उत्पन्न  करने वाले सितारों का टूटना ऐसे सीमान्त (मामूली) मामले होना चाहिए

यह खोज एक लंबे समय से चली आ रही पहेली को सुलझाने में मदद करती है। जहां एक ओर लंबे जीआरबी को सुपरनोवा के साथ जोड़ा जाना चाहिए  वहीं खगोलविद लंबे जीआरबी की तुलना में कहीं अधिक संख्या में सुपरनोवा का पता लगाते हैं। शोधकर्ताओं ने अब निष्कर्ष निकाला है कि छोटे जीआरबी उत्पन्न  करने वाले सितारों का टूटना ऐसे सीमान्त (मामूली) मामले होना चाहिए जिनसे  प्रकाश-गति से निकलने वाली धाराएं (जेट) सफलता या विफलता के कगार पर हैंI इस धारणा के अनुरूप एक निष्कर्ष यह भी है कि अधिकांश बड़े सितारे धारा (जेट) प्रवाहित करने और जीआरबी उत्पन्न किए बिना ही मर जाते हैं। अधिक मोटे तौर पर, यह परिणाम स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि केवल एक विस्फोट  की अवधि ही  विशिष्ट रूप से इसकी उत्पत्ति का संकेत नहीं देती है।