आज 18 सितंबर 2026 है। आज दूर्वा अष्टमी है। वर्ष 2026 में दूर्वा अष्टमी 19 सितंबर (शनिवार) को मनाई जाएगी (कुछ पंचांगीय गणनाओं के अनुसार 18 सितंबर को भी इसकी शुरुआत मानी गई है)। यह दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इस शुभ अवसर पर भगवान विष्णु की भक्ति भाव से पूजा की जाती है। यह पर्व भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को पड़ता है। इसी दिन राधा अष्टमी का पर्व भी मनाया जाता है।
जानें शुभ मुहूर्त
वर्ष 2026 में दूर्वा अष्टमी 19 सितंबर (शनिवार) को मनाई जाएगी (कुछ पंचांगीय गणनाओं के अनुसार 18 सितंबर को भी इसकी शुरुआत मानी गई है)। हिंदू पंचांग के अनुसार 18 सितंबर को अष्टमी तिथि सुबह 11:44 बजे तक है, इसलिए सुबह स्नान करके गणेश जी और दूर्वा घास की पूजा इस समय से पहले करना श्रेष्ठ रहेगा।
जानें पूजन विधि
भाद्रपद शुक्लअष्टमी को मनाई जाने वाली दूर्वाअष्टमी शाश्वत हरियाली और समृद्धि का प्रतीक पर्व है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन दूर्वा‑घास की पूजा से परिवार‑कुल की वृद्धि, मनोवांछित सिद्धि और आर्थिक उन्नति सहज हो जाती है। प्रातः स्नान के बाद शुद्ध घाटी की हरी दूर्वा को जल, कुंकुम और अक्षत अर्पित कर “ॐ दुर्वासविनमः” का जप किया जाता है; मान्यता है कि दूर्वा भगवान गणेश की प्रिय है, अतः बिना दुर्वा उनकी आराधना अधूरी रहती है। सावन की उमस उतरने और शरद की उजली धूप के बीच सम्पन्न यह व्रत घर‑आँगन को सतत् सौभाग्य से पुष्पित करता है, साथ ही सत्कर्मों में स्थिरता और मानसिक शांति का वरदान भी देता है।
जानें पौराणिक मान्यता
पौराणिक कथाओं के अनुसार कहा जाता है कि भगवान श्रीहरि ने कुर्म अवतार लिया और इस दौरान उनके रोम से ओर बाल निकलने लगे। भगवान् श्रीकृष्ण बोले-देवताओंके द्वारा अमृत का प्राप्ति के लिए क्षीरसागर के मथे जाने पर भगवान् विष्णुने अपनी जंघापर हाथ से पकड़कर मन्दराचल को धारण किया था। तब उनइस प्रकार मन्दराचल के वेग से भ्रमण करने के कारण रगड़ गए। विष्णुभगवान् के जो रोम उखड़कर समुद्ग में गिरे थे, पुनः समुद्र की लहरों द्वारा उछाले गये वे ही रोम हरित वणि सुन्दर एवं शुभ दूर्व के रूपमे उत्पन्न हुए । उसी दूर्वा पर देवताओंने मन्थनसे उत्पन्न अमृत का कुम्भ रखा, उससे जो अमृत के बिन्दु गिरे, उनके स्पर्शसे वह दूर्वा अजर-अमर हो गयी। वह देवताओं के लिये पवित्र तथा वन्द्य हुई। भाद्रपद की शुक्ला अष्टमी को गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, खर्जूर, नारियल , नारंगी, आम, बीजपूर, दही, अक्षत, माला आदि से श्रहीरि की और राधा रानी और दुर्वाका पूजन किया जाता है।