घुघुती, काफल और भट्ट के डुबुरक: शब्दों में उतरा पहाड़ का लोकजीवन
गौरव पांडे की इस कविता में उत्तराखंड की माटी की खुशबू, वहां के रीति-रिवाज, खान-पान और संस्कृति की सोंधी महक साफ झलकती है। आधुनिकता की दौड़ में भले ही लोग अपने घरों और गांवों से दूर शहरों की ओर पलायन कर गए हों, लेकिन पहाड़ की मिट्टी की खुशबू और वहां का अक्खड़पन आज भी प्रवासियों के दिलों में धड़कता है। उत्तराखंड के युवा लेखक और रचनाकार गौरव पांडे ने अपनी मार्मिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध कविता के माध्यम से इसी अहसास को शब्दों में पिरोया है। उनकी यह रचना हर उस शख्स के दिल को छू लेती है जो अपने घर-परिवार से दूर परदेस में रहकर भी अपने भीतर एक ‘छोटा सा पहाड़’ बसाए बैठा है।
घुघुती, बुरास और काफल की महक
पहाड़ी कविता 🖊️
घुघुती का फून्योलो का काफल बुरास प्योलो का,
मै गीत बार ल्यार यू आपण मन मे पाहाड़ ल्यों रयू।
ऊंचा निचा डान काना हरी भरी जंगला
मंदिरो मे म्याल लागू छंन्जरा मंगला ।
मैं मंदिरो प्रसाद ल्येरयू
हा आपण मंन मे पाहाड़ ल्योंरय।।
पकवान👇
घुघुत खजूर बड़ लगड़ भट्ट का डुबुरक
घूर पातला चाड पिटंगा सुर सुर संगीता आहा,
आमा बुबू घसायू और ग्वालू गीत आहा।
मे ग्वालों कि आवाज ल्यों रयू आपण मन मे पाहाड़ ल्योंरयू,।।
पहाड़ की भोजन 👇
घुघुत खजूर बड़ लगड़ भट्ट का डुबुरक झोइ ठपकी
चूड़कानी आलू का गडूक मे गौ घरो स्वाद ल्येरयू
आपण मन मे पाहाड ल्येरयू।।
लाख हरयाव लाख बगाव यो दिग मास भेटनै रया दूब जै हूगूरी पाति जै पुगूरी
फूल परी फलनों रया।।
मे ईज बाबू
आ सीक ल्योरय आपण मन में पाहाड ल्येरयू ।।।।।
लेखक🖊️ गौरव पाण्डे 🙏