होली 2026: रंगों का ही नहीं बल्कि शास्त्रीय संगीत, लोक परंपरा व सामूहिकता का एक अद्भुत संगम है कुमाऊंनी व गढ़वाल की होली, जानें इतिहास व परंपरा

होली का पर्व‌ आ गया और। रंगों का यह पर्व देशभर में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। उत्तराखंड में भी होली का एक खास महत्व है। यह शास्त्रीय संगीत, लोक परंपरा और सामूहिकता का एक अद्भुत संगम है। यहाँ की होली को मुख्य रूप से दो भागों में समझा जा सकता है- कुमाऊंनी होली और गढ़वाली होली।

जानें कुमाऊंनी होली का इतिहास और परंपरा

​कुमाऊं में होली का इतिहास काफी प्राचीन है और यह अपनी शास्त्रीय गायकी के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
📌📌चंद राजाओं का काल: माना जाता है कि कुमाऊंनी होली की शुरुआत 15वीं शताब्दी में चम्पावत के चंद राजाओं के दरबार से हुई थी। वहां से यह धीरे-धीरे अल्मोड़ा और फिर पूरे कुमाऊं में फैल गई।
📌📌शास्त्रीय प्रभाव: कुमाऊं की होली पर ब्रज और उत्तर प्रदेश के रामपुर घराने की गायकी का गहरा प्रभाव है। यही कारण है कि यहाँ की होली ‘बैठकी’ और ‘खड़ी’ दोनों रूपों में गाई जाती है।

कुमाऊंनी होली के तीन मुख्य रूप

📌📌बैठकी होली: यह पौष (दिसंबर-जनवरी) के महीने से ही शुरू हो जाती है। इसमें लोग घरों में बैठकर हारमोनियम और तबले की थाप पर राग-रागिनियों (जैसे राग काफी, पीलू और खमाज) में होली गाते हैं।
यह कुमाऊं की सबसे विशिष्ट और प्राचीन परंपरा है। इसकी शुरुआत पौष माह के पहले रविवार (दिसंबर-जनवरी) से ही हो जाती है।
• ​स्वरूप: यह पूरी तरह से शास्त्रीय संगीत पर आधारित होती है। लोग घरों के आंगन या कमरों में बैठकर हारमोनियम और तबले के साथ राग-रागिनियों में होली गाते हैं।
• ​समय का महत्व: इसमें समय के अनुसार राग बदले जाते हैं। दोपहर में राग काफी, पीलू, धमार और शाम को राग कल्याण, श्याम कल्याण या खमाज गाया जाता है।
• ​विषय: इन गीतों में केवल रंग-गुलाल नहीं, बल्कि अध्यात्म, कृष्ण-राधा की लीलाएं और जीवन का दर्शन होता है।
📌📌खड़ी होली: यह शिवरात्रि के बाद शुरू होती है। इसमें लोग सफेद कुर्ता-पाजामा और टोपी पहनकर घेरा बनाकर नाचते हुए होली गाते हैं। इसमें मुख्य रूप से ढोल और मजीरा बजाया जाता है।
यह बैठकी होली के बाद, विशेष रूप से शिवरात्रि के आसपास शुरू होती है और ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक प्रचलित है।
• ​स्वरूप: इसमें पुरुष सफेद कुर्ता-पाजामा और सिर पर गांधी टोपी पहनकर एक घेरा बनाते हैं। वे ढोल और मजीरे की थाप पर थिरकते हुए सामूहिक रूप से गाते हैं।
• ​ऊर्जा: बैठकी होली जहाँ शांत और गंभीर होती है, वहीं खड़ी होली अत्यंत ऊर्जावान और उल्लासपूर्ण होती है।
• ​विशिष्टता: इसमें एक मुख्य गायक (मुखिया) पंक्ति गाता है और बाकी समूह उसे दोहराते हुए कदमताल करता है।
📌📌महिला होली: यह विशेष रूप से महिलाओं द्वारा मनाई जाती है, जिसमें वे स्वांग (नाटक) और लोक गीतों के जरिए खुशियां बांटती हैं।
महिलाओं द्वारा आयोजित यह होली कुमाऊं के सामाजिक ताने-बने का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
• ​स्वरूप: यह बैठकी होली का ही एक रूप है, लेकिन इसे केवल महिलाएं गाती हैं। इसमें रागों के साथ-साथ हास्य-व्यंग्य (स्वांग) और लोक गीतों का पुट अधिक होता है।
• ​भाव: इसमें महिलाएं अपने सुख-दुख, ससुराल की बातें और देवर-भाभी के ठिठोली भरे गीत गाती हैं। इसमें नृत्य भी शामिल होता है।

अन्य विशेष रस्में

• ​चीर बंधन: एकादशी के दिन गांव के मंदिर या सार्वजनिक स्थान पर एक लंबा डंडा (चीर) गाड़ा जाता है, जिस पर हर परिवार के सदस्य के नाम का रंग-बिरंगा कपड़ा बांधा जाता है। इसे ‘होली का टीका’ भी कहते हैं।
• ​छरड़ी (Chharadi): यह होली का मुख्य दिन होता है जब रंगों से खेला जाता है।
• ​आशीष: होली के समापन पर “ज्यूं रया, जागी रया” (जीते रहो, जागृत रहो) कहकर आशीर्वाद देने की परंपरा सबसे महत्वपूर्ण है।


जानें गढ़वाली होली का इतिहास और परंपरा

​गढ़वाल में होली का स्वरूप कुमाऊं से थोड़ा भिन्न और अधिक ग्रामीण व उल्लासमय होता है।
📌📌धार्मिक महत्व: गढ़वाल में होली को ‘प्रहलाद’ और ‘होलिका’ की पौराणिक कथा से जोड़कर देखा जाता है। यहाँ कई गांवों में होली के दिन ‘पांडव नृत्य’ या स्थानीय देवताओं की पूजा का भी विशेष महत्व होता है।
📌📌बैठकी होली का अभाव: कुमाऊं की तुलना में गढ़वाल में शास्त्रीय ‘बैठकी’ होली का चलन कम है। यहाँ सामूहिक नृत्य और गीतों पर अधिक जोर दिया जाता है।

मुख्य विशेषताएं

📌📌लोक गीतों की प्रधानता: यहाँ ‘हुड़किया’ (हुड़क बजाने वाले) मुख्य भूमिका निभाते हैं। गीतों में स्थानीय देवी-देवताओं का आह्वान और प्रकृति का वर्णन होता है।
📌📌गांव का सामूहिक उत्सव: गढ़वाल में लोग टोली बनाकर एक गांव से दूसरे गांव जाते हैं, जिसे ‘पश्वा’ या ‘होली की टोली’ कहा जाता है।
📌📌चीर बंधन: यहाँ भी कुमाऊं की तरह ‘चीर’ (एक ध्वजनुमा लकड़ी जिस पर रंग-बिरंगे कपड़े बंधे होते हैं) बांधी जाती है, जिसे होलिका दहन के दिन जलाया जाता है।

कुमाऊंनी बैठकी होली (राग आधारित)

​बैठकी होली में रागों का बहुत महत्व होता है। यह गीत अक्सर शाम के समय गाया जाता है:
गीत के बोल:
“सिद्धि को दाता विनायक गणपति, गजानंद सोहे…”
“सब देवों में प्रथम पूज्य, रिद्धि-सिद्धि के दाता…”
भाव: कुमाऊं में होली की शुरुआत हमेशा भगवान गणेश की वंदना से होती है। इसके बाद ही अन्य रागों और श्रृंगार रस के गीतों का नंबर आता है।

कुमाऊंनी खड़ी होली (सामूहिक नृत्य गीत)

​खड़ी होली में जोश और लय (ताल) का विशेष महत्व होता है। लोग घेरा बनाकर इसे गाते हैं:
गीत के बोल:
“जल कैसे भरूं यमुना गहरी…”
“होली खेल रहे नंदलाल, गोकुल की गलियों में…”
भाव: इन गीतों में अक्सर भगवान कृष्ण और राधा की लीलाओं का वर्णन होता है। “जल कैसे भरूं” वाला गीत एक सखी की दुविधा को दर्शाता है जो कृष्ण की शरारतों के कारण यमुना किनारे जाने से डरती है।

गढ़वाली होली के लोक गीत

​गढ़वाल में होली के गीतों में स्थानीय बोली और लोक वाद्यों (ढोल-दमोह) की थाप प्रमुख होती है:
गीत के बोल:
“ऐगे होली, खेलो रे भाई, सब मिलि कै रंग लगावा…”
“ऊंचा पहाड़ो मा खिली गै बुरांश, फागुन की ऋतु ऐगे…”
भाव: इस गीत का अर्थ है— “होली आ गई है, सब मिलकर रंग लगाओ। ऊंचे पहाड़ों पर बुरांश (उत्तराखंड का राज्य पुष्प) खिल गया है और फागुन की ऋतु आ गई है।” यहाँ प्रकृति का वर्णन त्योहार की खुशियों के साथ बुना जाता है।