October 17, 2021

एस0एस0जे0विश्वविद्यालय में पर्यावरण संरक्षण में लोकपर्वों की भूमिका विषय पर दो दिवसीय वेबिनार का हुआ उद्घाटन

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चित्रकला विभाग, सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय, अल्मोड़ा द्वारा ‘पर्यावरण संरक्षण में लोक पर्वों की भूमिका‘ विषय पर दो दिवसीय वेबिनार का उद्घाटन वेबिनार के संरक्षक और सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय के मा0 कुलपति प्रो0 नरेंद्र सिंह भंडारी, मुख्य अतिथि रूप में पद्मश्री प्रो0 राजेश्वर आचार्य (अध्यक्ष, नाटय एवं संगीत अकादमी, लखनऊ), मुख्य वक्ता के तौर पर प्रो0 प्रेमचंद विश्वकर्मा (पूर्व विभागाध्यक्ष ललित कला म0ग0क0वि0प0 वाराणसी), विशिष्ट अतिथि रूप में कला भूषण डॉ0 राजेन्द्र सिंह पुंडीर (पूर्व अध्यक्ष, ललित कला अकादमी), परिसर निदेशक प्रो0 नीरज तिवारी, मुख्य वक्ता प्रो0 जे0 एस0 रावत, प्रो0 शेखर चंद्र जोशी, और वेबिनार की संयोजक प्रो0 सोनू द्विवेदी ‘शिवानी‘ ने किया।

वेबिनार की संयोजक प्रो0 सोनू द्विवेदी ने सभी का वेबिनार की रूपरेखा प्रस्तुत की

वेबिनार की संयोजक प्रो0 सोनू द्विवेदी ने सभी का आभार प्रकट करते हुए वेबिनार की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि कुलपति प्रो0 एन0एस0भंडारी के निर्देशन में यह वेबिनार आयोजित किया गया है। जल संवर्धन, वन और पर्यावरण के संरक्षण के लिए कुलपति प्रो0 नरेंद्र भंडारी जी का अविस्मरणीय योगदान है। प्रो0 शिवानी ने कहा कि उनके निर्देशन में हमने कुमाऊँ के लोकपर्व हरेला पर दो दिवसीय वेबीनार आयोजित किया है। चित्रकला में हरेला पर्व को लेकर चित्रकला एवं पोस्टर प्रतियोगिताएंव आयोजित की गई हैं। उन्होंने हरेला पर्व का पर्यावरण के संरक्षण एवं संवर्धन पर महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।

यह महोत्सव हमारा नवीन चिंतन है

उद्घाटन सत्र पर सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 एन0 एस0 भंडारी ने कहा कि हरेला महोत्सव हमारे लोक में फैले हुए पर्यावरणीय ज्ञान को बाहर लाकर उसकी महत्ता को समाज को बताना है। यह महोत्सव हमारा नवीन चिंतन है। हम हरेला महोत्सव के माध्यम से इस प्रकृति से भावात्मक रूप से जुड़ेंगे। उन्होंने कहा कि हमारे लोकपर्वों में पर्यावरण बहुत महत्वपूर्ण बिन्दु रहा है। पर्यावरण का निरंतर क्षरण होने से वैश्विक पटल पर चिंतन किया जा रहा है। भारतीय जनमानस पुरातन काल से ही प्रकृति की पूजा करते आए हैं, इसलिए हमें पर्यावरण के संरक्षण के लिए संवेदनशीलता के साथ प्रयास करने होंगे। उन्होंने दृश्यकला संकाय को संबोधित करते हुए कहा कि दृश्यकला संकाय लोकसंस्कृति, पर्यावरण संरक्षण  के लिए अपनी भूमिका निभाएगा, ऐसी मेरी आशा है। यह विभाग निरंतर अपनी पहचान बना रहा है। इसके लिए सभी के सहयोग के लिए बधाईयां। प्रो0 भंडारी ने कहा कि यह विभाग ऐसे ही निरंतर कार्य करता रहा तो यह हमारे विश्वविद्यालय की यह एक विशिष्ट पहचान बनेगा। यह विभाग देश-विदेश में दृश्यकलाओं के अध्ययन केंद्र के लिए अपनी अलग पहचान बना सकेगा। हरेला महोत्सव के संबंध में कहा कि इस महोत्सव के माध्यम से जनमानस आने वाले समय में अपने पर्यावरण और अपने समाज को बेहतर बनाने के लिए चिंतन कर सकें। वह प्रेरित हो सकेंगे।


आज की परिस्थिति में सभी कलाकार जागृत हैं। वो हर परिस्थिति में समाज की गतिविधियों को देख रहे हैं

विशिष्ट अतिथि के रूप में कलाभूषण श्री आर0 एस0 पुंडीर ने कहा कि आज की परिस्थिति में सभी कलाकार जागृत हैं। वो हर परिस्थिति में समाज की गतिविधियों को देख रहे हैं। उन्होंने दृश्यकला संकाय के प्रयासों की सराहना की। श्री पुंडीर ने कहा कि लोकपर्वों को हमने इन 70 सालों में भुला दिया है। हमने अपने संस्कार, लोकपर्वों के प्रति असंवेदनशीलता दिखाई है जो सही नहीं है। अंग्रेजों ने हमें जो सीखाया है हम वही सीखे हैं और अंग्रेजों के चक्कर में हमने अपनी परम्पराओं को तक भुला दिया है। आज हमें अपने लोकपर्वों, संस्कारों को जानने की आवश्यकता है।

हरेला हमारी जीवंतता का प्रतीक है। लोकपर्व हमें लोक के दर्शन कराता है

मुख्य अतिथि के रूप में पद्मश्री राजेश्वर आचार्य ने कहा कि पहले प्रकाश के अभाव में व्यक्ति असुरक्षित होता था, उस दृष्टि से गुफाओं में जीवन जीता था। आदिम समय में प्रकाश की सर्वप्रथम आवश्यकता आदिमानव को थी तो उसने अग्नि की खोज की और उससे प्रकाश प्राप्त किया। जीवन को जीने के लिए  उसने आखेट किया, उसने फिर प्रकृति की उपासना की तरफ वह बढ़ा। उन्होंने ‘अस्तो मा सद्गमय‘ की दार्शनिक रूप से व्याख्या कर मानव के विकासक्रम और उसकी दिशा की तरफ प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हम अंधकार से प्रकाश की ओर आए हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि हम कृषि प्रधान देश में हैं। रचनात्मकता हमारे रगों में है। हमारे विकास की यात्रा बहुत लंबी है। हम अपने सामने अंकुरण, पल्लवित, पुष्पित व फिर फलित होने की प्रक्रिया को साक्षात् देखते हैं। हरेला हमारी जीवंतता का प्रतीक है। लोकपर्व हमें लोक के दर्शन कराता है। हम अमूर्त से मूर्त की चलते आ रहे हैं। हम परिष्कार, परिमार्जन, संतुलन पर टिके हैं। हम हरियाला की उपासना करते हैं। यह प्राण का संकेत है।  

कला ही हमारी संस्कृति के अतीत को प्रदर्शित करती है

मुख्य वक्ता प्रो0 प्रेमचंद्र विश्वकर्मा ने कहा कि संस्कृति वास्तव में शिक्षा का रूप है। हम हर चीज सीखते गए हैं। आज हम किसी भी चीज को बिना शिक्षा के नहीं प्राप्त कर सके हैं। कला ही हमारी संस्कृति के अतीत को प्रदर्शित करती है। हम अपने इतिहास को कला के माध्यम से जानते हैं। दुनिया का कोई ऐसा विषय नहीं है जिसमें कला विद्यमान न हो। कला के माध्यम से ही हम अपने पूर्वजों के क्रिया-कलापों को जानते हैं। कला का हर क्षेत्र में योगदान है। यहां तक कि चिकित्सा क्षेत्र में भी कला का योगदान है। हरियाली अर्थात् हरेले के संबंध में उन्होंने कहा कि देश के विभिनन राज्यों में यह अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है। जनसमाज में उत्साह, उमंग भरने के लिए लोकपर्व मनाए जाते हैं। हमारे जीवन को आनंदमय बनाने के लिए ऐसे पर्वों का होना जरूरी है। यह उत्सव, पर्व हमें पीड़ा से आनंद की ओर ले जाती हैं। इनके माध्यम से हम प्रकृति से जुड़ते हैं। हरियाली से ही हमारा मन झूमता है। हम जिस प्रकार के पर्यावरण में रहते हैं, उस प्रकार के पर्व मनाते हैं। उन पर्वों में कला के विविध रूपों को हम देखते हैं। उन्होंने नागपंचमी, दीपावली, आषाढ़ी पर्वों की भी चर्चा की। साथ ही उन्होंने हरेला महोत्सव के लिए कुलपति प्रो0 भंडारी, सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय और दृश्यकला संकाय के प्रयासों की सराहना की।  

गायना थ्योरी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आने वाले दशकों में यह सिद्ध हो जाएगा कि यह पृथ्वी सजीव है

पर्यावरणविद् प्रो0 जे0एस0रावत ने पर्यावरण और विज्ञान विषय पर अपना व्याख्यान देते हुए कहा कि जो भी हम ज्ञान ले रहे हैं वह हमारे स्प्रिचुअल साइंस से ले रहे हैं। हमारे पूर्वजों के पास पर्यावरण और उसका विज्ञान का ज्ञान था। पर्यावरण, पांच तत्वों के योग से बना है। यह धरती सजीव है। आने वाला समय में यह सभी सच साबित होंगे। गायना थ्योरी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आने वाले दशकों में यह सिद्ध हो जाएगा कि यह पृथ्वी सजीव है। उन्होंने प्रस्तुतीकरण के माध्यम से अपनी बात रखते हुए कहा कि पृथ्वी को संचालित करने के लिए एक व्यवस्था बनी हुई है। ये ऊर्जा से संचालित है। उन्होंने जल मंडल, स्थल मंडल, वायुमंडल, ओजमंडल, कार्बनडाई ऑक्साइड, सूर्य, पृथ्वी, वृक्षों के कार्य, पारिस्थितिकी आदि बिन्दुओं पर भी विस्तार से प्रकार डाला।

लोकपर्व हमें पर्यावरण से जोड़ने के लिए अपनी भागीदारी निभाते हैं

विशेष वक्ता प्रो0 शेखर चंद्र जोशी ने कुमाउनी संस्कृति विषय पर विस्तार से अपना व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि कुमाउनी समाज के पर्वों में प्रकृति जुड़ी है। लोकपर्वोंं में लोककलाओं और पर्यावरण के प्रति जुड़ाव को हम नजदीक से देखते आए हैं। लोकपर्व हमें पर्यावरण से जोड़ने के लिए अपनी भागीदारी निभाते हैं।

देश के विद्वतजनों ने अपनी भागीदारी की है

परिसर निदेशक प्रो0 नीरज तिवारी ने कहा कि सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय, अल्मोड़ा में ‘हरेला महोत्सव‘ के तहत निबंध, भाषण प्रतियोगिता, पोस्टर/चित्रकला प्रतियोगिता, गोष्ठी, वेबिनारों का संचालन किया गया है। इनमें हरेला पर्व का पर्यावरण संरक्षण में योगदान और महत्व पर विस्तार से चर्चा हुई है। देश के विद्वतजनों ने अपनी भागीदारी की है। इन कार्यक्रमों में पर्यावरण संरक्षण को लेकर चिंतन किया जा रहा है। हम पर्यावरण के संरक्षण के लिए जमीनी सतह पर कार्य करें। प्रो0 तिवारी ने आगे कहा कि हरेला हमारा लोकपर्व है। इस लोकपर्वां में कृषि, ग्रामीण जनजीवन का प्रकृति से जुड़ाव को आज भी हम देखते हैं। उन्होंने सभी अतिथियों का स्वागत एवं आभार जताया।

वेबिनार में यह लोग हुए शामिल

वर्चुअल वेबिनार में चित्रकला विभाग के डॉ0 संजीव आर्या, विनीत बिष्ट, श्री कौशल कुमार, श्री चंदन आर्या, श्री रमेश मौर्य, श्री संतोष सिंह मेर, पूरन सिंह, जीवन चंद्र जोशी, विश्वविद्यालय मीडिया प्रभारी डॉ0 ललित चंद्र जोशी, डॉ0 शिवानी शुक्ला, अंशिका प्रजापति, अवनीश कुमार, डॉ0 प्रतीश आचार्य, डॉ0  पूरन सिंह बोरा, कंचन कृष्ण, पूजा रानी, सुधीर दुबे, कीर्ति रावत, पवन यादव, नेहा मर्तोलिया, पूजा, हिमांशु आर्या, गुंजन आर्या आदि सहित देशभर के विद्व़ान, शिक्षक व छात्र शामिल हुए।