आज 29 मार्च 2026 है। आज वामन द्वादशी है। वामन द्वादशी भगवान विष्णु के वामन अवतार की सर्वोच्च कृपा का प्रतीक है, जो भक्तों को अपने आध्यात्मिक मार्ग पर विनम्रता, धर्म और भक्ति का अभ्यास करने के लिए प्रेरित करती है। वामन अवतार भगवान विष्णु के दस अवतारों में से एक अवतार है। वामन अवतार उनका पहला मनुष्य रूप का अवतार है। इससे पहले के अवतार भगवान विष्णु के पशु रूप में थे जिसमें मत्स्य अवतार, कूर्म अवतार, वराह अवतार और नृसिंह अवतार थे शामिल हैं। आज के दिन भगवान विष्णु के पांचवे अवतार वामन की प्रतिमा या चित्र लगाकर पूजा की जाती है।
खास है महत्व
2026 में वामन द्वादशी रविवार, 29 मार्च, 2026 को मनाई जाएगी । यह शुभ दिन उपवास, प्रार्थना और गहन चिंतन का समय है। भक्त भक्तिमय कार्यों, भगवान वामन के पवित्र नामों के जप और हृदय-मन को शुद्ध करने वाले अनुष्ठानों के माध्यम से भगवान वामन की कृपा प्राप्त करते हैं। ऐसा माना जाता है कि श्रद्धापूर्वक वामन द्वादशी मनाने से पापों से मुक्ति मिलती है, दिव्य सुरक्षा प्राप्त होती है और भक्तों को शांति, समृद्धि और परम आध्यात्मिक पूर्णता का मार्ग प्राप्त होता है।
जानें शुभ मुहूर्त
• द्वादशी तिथि प्रारंभ 29 मार्च 2026 को प्रातः 07:46 बजे से
• द्वादशी तिथि समाप्त 30 मार्च, 2026 को प्रातः 07:09 बजे
• 30 मार्च को द्वादशी पारण का समय प्रातः 06:34 बजे से प्रातः 09:02 बजे तक रहेगा।
जानेंवामन जयंती व्रत कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु के परम भक्त प्रहलाद के पौत्र और दानवीर राजा होने के बावजूद राजा बलि एक अहंकारी राक्षस था । वह सदैव अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करता था। दैत्य राजा बलि ने इन्द्र देव को पराजित कर स्वर्ग पर भी कब्जा जमा लिया था । अत्यन्त पराक्रमी और अजेय बलि अपने बल से स्वर्ग लोक, भू लोक और पाताल लोक का स्वामी बन गया । जब इंद्र देव को स्वर्ग लोक से निकाल दिया गया तो सभी देवता विष्णु भगवान के पास पहुंचे और उन्होंने भगवान विष्णु को पूरी आप बीती सुनाई जिसके बाद भगवान विष्णु ने पांचवे अवतार के रूप में वामन अवतार के रूप में जन्म लिया । इसके बाद भगवान वामन एक एक बौने ब्राह्मण के वेश में राजा बलि के पास गए और उनसे अपने रहने के लिए तीन कदम के बराबर भूमि देने का आग्रह किया। उनके हाथ में एक लकड़ी का छाता था। राजा बलि अपने वचन के बहुत पक्के थे और वो मान गए और उन्हें तीन पग भूमि देने का वादा कर दिया। वामनदेव ने अपने पहले ही कदम में पूरा भूलोक (पृथ्वी) नाप लिया तत्पश्चात दूसरे कदम में देवलोक नाप लिया और तीसरे कदम के लिए कोई भूमि ही नहीं बची, लेकिन राजा बलि अपने वचन के पक्के थे, इसलिए तीसरे उन्होंने अपना सिर झुकाकर कहा कि तीसरा कदम प्रभु यहां रखें। वामन देव राजा बलि की वचनबद्धता से अति प्रसन्न हुए। इसलिए वामन देव ने राजा बलि को पाताल लोक देने का निश्चय किया और अपना तीसरा कदम बलि के सिर पर रखा। इसके बाद बलि पाताल लोक में पहुंच गये।