27 अक्टूबर: छठ पर्व की धूम, आज शाम को डूबते सूर्य को दिया जाएगा अर्घ्य, ग्रंथों में भी है छठ महापर्व का उल्लेख, जानें

आज 27 अक्टूबर 2025 है। पूरे भारत में जगह जगह छठ पर्व की धूम है। 27 अक्टूबर की शाम को डूबते सूर्य और 28 अक्टूबर की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इस साल सूर्य षष्ठी 2025 यथा छठ पूजा 2025 का चार दिवसीय अनुष्ठान नहाय-खाय के साथ 25 अक्टूबर से आरंभ हो गया है।

जानें कब दिया जाएगा सूर्य अर्घ्य

हर साल छठ पूजा दिवाली से 6 दिन बाद की जाती है। पंचांग के अनुसार, खरना पूजन, कार्तिक शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को होता है। कार्तिक छठ पूजा 2025 के अनुष्ठानों में छठ घाटों पर 27 अक्टूबर, सोमवार को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य अर्पण किया जाएगा। 28 अक्टूबर 2025, मंगलवार को प्रात: बेला में उदीयमान आदित्य देव को अर्घ्य अर्पित किया जाएगा। जिसके बाद इस छठ पर्व 2025 का पारण/समापन हो जाएगा।

देश में गुप्त काल से मनाया जा रहा है महापर्व छठ

एक मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उल्लेखनीय है कि गुप्त काल से ही छठ महापर्व का त्योहार मनाया जा रहा है। इसका उल्लेख गुप्तकालीन जो सिक्के मिले हैं, उनमें षष्ठीदत्त नाम का सिक्का भी मिलता है। पाणिनी ने जो नामकरण की प्रक्रिया बताई है, उसके अनुसार देवदत्त, ब्रह्मदत्त और षष्ठीदत्त इन शब्दों का अर्थ इस प्रकार लगाया जाता है: देवदत्त का मतलब देवता के आशीर्वाद से जन्म होना, ब्रह्मदत्त का मतलब ब्रह्मा के आशीर्वाद से और षष्ठी देवी के आशीर्वाद से जन्मे हुए पुत्र षष्ठीदत हुए। गुप्त काल में षष्ठीदत नाम का प्रचलन था। इससे प्रमाणित होता है कि छठी मैया की पूजा उस समय भी होती थी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध इतिहास को वासुदेव शरण अग्रवाल ने अपनी पुस्तक पाणिनिकालीन भारतवर्ष में इसका उल्लेख किया है।

ग्रंथों में भी छठ का उल्लेख

मिथिला के प्रसिद्ध निबंधकार चंडेश्वर ने 1,300 ईस्वी में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक कृत्य रत्नाकर में महापर्व छठ का उल्लेख किया है। उसके बाद मिथिला के दूसरे बड़े निबंधकार रूद्रधर ने 15वीं शताब्दी में कृत्य ग्रंथ में चार दिवसीय छठ पर्व का विधान विस्तृत रूप से दिया है। यह वर्णन ऐसा ही है जैसा आज हम लोग छठ पर्व मनाते हैं। इस प्रकार पिछले 700 वर्षों से यह विवरण मिलता है, जिसके अनुसार आज का छठ व्रत मनाया जाता है।1,300 ईसवी के पहले चंदेश्वर ने छठ व्रत के ऊपर प्रकाश डाला। 1285 ईसवी में हेमाद्री ने चतुवर्ग चिंतामणी ग्रंथ में और 1,130 ईसवी के आसपास लक्ष्मीधर ने कृत्य कल्पतरु में सूर्योपासना एवं षष्ठी व्रत का विधान बताया है। लक्ष्मीधर गहड़वाल वंश के प्रसिद्ध शासक गोविंद चंद्र के प्रमुख मंत्री और सेनापति थे।

क्यों छठ पर्व में सूर्य को अर्घ्य देकर की जाती है पूजा ?

उल्लेखनीय है कि छठ व्रत सनातन धर्मावलंबियों का अत्यंत महत्वपूर्ण त्योहार है। इस महापर्व पर भगवान भास्कर और छठी मैया की पूजा-अर्चना होती है। सूर्य की उपासना का यह सबसे महत्वपूर्ण पर्व है। प्रत्येक मास की सप्तमी तिथि विशेषकर शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि सूर्य भगवान की तिथि मानी जाती है और इस दिन इनकी उपासना का विधान है। इसके साथ ही कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि सबसे पावन तिथि मानी जाती है। इसी कारण सूर्य भगवान की पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष में सप्तमी के दिन उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देकर पूजा की जाती है।