पिथौरागढ: आस्था और विश्वास का प्रतीक हिलजात्रा पर्व, रखता है विशिष्ट पहचान

पिथौरागढ से जुड़ी खबर सामने आई है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ की हिलजात्रा प्रदेश में विशिष्ट पहचान रखती है। यह आस्था, विश्वास और रोमांच का प्रतीक है।

हिलजात्रा पर्व आ रहा नजदीक

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हिलजात्रा पर्व नजदीक आ रहा है। जिसके लिए युवा, बुजुर्ग तैयारी में जुट गए हैं। हिलजात्रा पर्व जिले में विशिष्ट पहचान के साथ आस्था से जुड़ा है। जो मुखौटा नृत्य शैली का उदाहरण है। इस पर्व पर बैल, हिरण, चीतल और लखिया भूत जैसे दर्जनों पात्र मुखौटों के साथ मैदान में उतरकर दर्शकों को रोमांचित करते हैं। हिलजात्रा का समापन लखिया भूत के आगमन के साथ होता है।

खास है पिथौरागढ की हिलजात्रा

रिपोर्ट्स के मुताबिक सोरघाटी पिथौरागढ़ में मनाए जाने वाला एक ऐसा ही ऐतिहासिक लोकपर्व है हिलजात्रा। इस पर्व में इस्तेमाल होने वाले मुखौटे, दिखने में साधारण से लगने वाले इन मुखौटों का इतिहास करीब 500 साल पुराना है। जिसे नेपाल के राजा ने पिथौरागढ़ के कुमौड़ गांव में रहने वाले चार महर भाईयों को उनकी वीरता के प्रतीक के रूप में भेंट किये थे। इसके बाद से ही पिथौरागढ़ में इन मुखौटों का इस्तेमाल कर यहां हिलजात्रा नाम से उत्सव शुरू हुआ तभी से पिथौरागढ़ की सोरघाटी में ये पर्व बड़ी धूम धाम से मनाया जाता रहा है। मान्यता है कि भगवान शिव के 12वें गण लखिया की उत्पत्ति उनके क्रोध से हुई जिसके चलते लखिया हमेशा क्रोध में ही रहतें है। लखिया के क्रोध को शांत करने के लिए ग्रामीण फूल अक्षत से उनकी फूल अक्षत से उनकी अर्चना कर उन्हें मनाते हैं। इस अर्चना से लखिया खुश होते हैं और लोगों को धन धान्य का आशीर्वाद देते हैं।