आज 13 सितंबर 2026 है। आज सामवेद उपाकर्म है। हिंदू धर्म में वेदों का विशेष महत्व माना गया है और इन्हीं वेदों की परंपरा को जीवित रखने के लिए उपाकर्म का आयोजन किया जाता है। सामवेद उपाकर्म विशेष रूप से सामवेद का अध्ययन करने वाले ब्राह्मणों और विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। इस दिन वेद अध्ययन का पुनः आरंभ किया जाता है, यज्ञोपवीत बदला जाता है और ऋषियों का स्मरण करके उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। यह पर्व वैदिक संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण का संदेश देता है।
बदलते हैं यज्ञोपवीत
साल 2026 में सामवेद उपाकर्म का पर्व शनिवार, 12 सितम्बर 2026 को मनाया जाएगा। यह दिन सामवेद से जुड़े ब्राह्मणों और वेद अध्ययन करने वाले लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस अवसर पर ब्राह्मण जन वैदिक परंपराओं के अनुसार श्रौत अनुष्ठान करते हैं तथा अपना उपनयन यानी यज्ञोपवीत बदलते हैं। उपाकर्म एक प्राचीन वैदिक अनुष्ठान है, जिसका पालन आज भी ब्राह्मण समाज द्वारा श्रद्धा और नियमपूर्वक किया जाता है। इस दिन वेद अध्ययन का पुनः आरंभ करने, ऋषियों का स्मरण करने और आत्मशुद्धि का विशेष महत्व माना जाता है। उपाकर्म के दौरान “यज्ञोपवीतं धरणम्” की प्रक्रिया भी विशेष महत्व रखती है। इसमें भक्त नया पूनल या यज्ञोपवीत धारण करते हैं। सबसे पहले दोनों हाथ जोड़कर स्थान ग्रहण किया जाता है और आचमन किया जाता है। इसके बाद पुरानी पूनल को उतारकर नियमपूर्वक तोड़ा जाता है और फिर दोबारा आचमन किया जाता है। इसके पश्चात नया यज्ञोपवीत धारण किया जाता है।
खास है महत्व
सामवेद उपाकर्म का महत्व धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत विशेष माना गया है। यह पर्व वेदों की परंपरा को बनाए रखने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम है। इस दिन वेद अध्ययन का पुनः आरंभ करने से ज्ञान में वृद्धि और बुद्धि की शुद्धि होने की मान्यता है। यज्ञोपवीत बदलना इस पर्व का महत्वपूर्ण भाग माना जाता है। इसे आत्मशुद्धि और नए संकल्प का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विधिपूर्वक किए गए कर्म व्यक्ति को पापों से मुक्ति और पुण्य प्रदान करते हैं।