मॉनसून की शुरूआत के साथ ही जून के अंतिम सप्ताह में मछली मारने के सामूहिक मौण मेले का आयोजन किया जाता है. इस मेले में क्षेत्र के हजारों की संख्या में बच्चे, युवा और बुजुर्ग नदी की धारा के साथ मछलियां पकड़ने उतर जाते हैं। उत्तराखंड के टिहरी जिले के जौनपुर क्षेत्र का ऐतिहासिक राज मौण मेला धूमधाम से मनाया गया। राजशाही के जमाने से मनाए जाने वाले मेले में गुरुवार सुबह बड़ी संख्या में लोग ढोल दमाऊं और रणसिंघा के साथ अलगाड़ नदी में पहुंचे। वहां मेलार्थियों ने पूजा -अर्चना करने के बाद नदी में तिमुर का पाउडर डाला और मछली पकड़ने के लिए कूद पड़े। ढोल नगाड़ों की थाप पर ग्रामीणों ने लोकनृत्य भी किया।
तिमुर का पाउडर बनाकर मौण डालने की जिम्मेदारी हर साल अलग-अलग पट्टी के लोगों दी जाती है

जौनपुर के ऐतिहासिक मौण मेले में लोग गुरुवार सुबह करीब 10 बजे से जुटने शुरू हो गए थे। परंपरा के मुताबिक तिमुर का पाउडर बनाकर मौण डालने की जिम्मेदारी हर साल अलग-अलग पट्टी के लोगों को दी जाती है। इस साल लालूर पट्टी के लोगों ने पाउडर बनाया। देवन, घंसी, खडसारी, मीरागांव, डियागांव, छानी, टिकरी, ढकरोल व सल्ट गांव के ग्रामीणों ने करीब 29 कट्टे तिमुर का पाउडर तैयार किया और इसकी तैयारी काफी दिन पहले शुरू कर दी गई थी। ढोल- दमाऊं और रणसिंघे के साथ पहुंचे लोगों ने पहले अलगाड़ नदी में पूजा की और उसके बाद उन्होंने नदी में मौण डालने की परंपरा निभाई। उसके बाद बड़ी संख्या में पहुंचे बच्चे, बड़े और बुजुर्ग मछली पकड़ने नदी में कूद पड़े।
मौण मेले में 114 गांव के लोग होते हैं शामिल
मौण मेले में जौनपुर सहित जौनसार, उत्तरकाशी और मसूरी क्षेत्र से लगे करीब 114 गांव के लोग शामिल होते हैं। घंसी के प्रधान जगमोहन सिंह कंडारी, बलवीर सिंह मलियाल, शूरवीर सिंह, रणवीर सिंह ने बताया कि मेले में बड़ी संख्या में बाहर के पर्यटक भी यहां पहुंचे थे।
ऐतिहासिक मौण मेले की शुरुआत 1866 में हुई
ऐतिहासिक मौण मेले की शुरुआत 1866 में तत्कालीन टिहरी नरेश ने की थी। तब से जौनपुर में निरंतर इस मेले का आयोजन किया जाता है। क्षेत्र के बुजुर्गों का कहना है कि इसमें टिहरी नरेश स्वयं अपने लाव लश्कर एवं रानियों के साथ मौजूद रहते थे। मौण तिमुर् के तने की छाल को सुखाकर तैयार किए गए महीन चूर्ण को कहते हैं।
तिमुर पाउडर से बेहोश हो जाती हैं मछलियां
तिमुर का उपयोग दांतों की सफाई के अलावा कई अन्य औषधियों में किया जाता है। अलगाड़ नदी के पानी से खेतों की सिंचाई भी होती है। मछली मारने के लिए नदी में डाला गया तिमुर का पाउडर पानी के साथ खेतों में पहुंचकर चूहों और अन्य कीटों से फसलों की रक्षा करता है। जिसे तिमुर पाउडर को ग्रामीण मछली पकड़ने के लिए नदी में डालते हैं, उसको बनाने के लिए गांव के लोग एक माह पूर्व से तैयारी में जुट जाते है। प्राकृतिक जड़ी बूटी और औषधीय गुणों से भरपूर तिमुर के पौधे की तने की छाल को ग्रामीण निकालकर सुखाते हैं फिर छाल को ओखली या घराट में बारीक पीसकर पाउडर तैयार करते हैं। तिमुर पाउडर के नदी में पड़ने के बाद कुछ देर के लिए मछलियां बेहोश हो जाती हैं। पाउडर से मछलियां मरती नहीं हैं।