उत्तराखंड: उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब केवल ग्लेशियरों के पिघलने तक सीमित नहीं रह गया है।
बना हुआ है यह खतरा
इससे बनने वाली हिमनदीय झीलें भविष्य में बड़े संकट का संकेत दे रही हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रतिष्ठित ‘नेचुरल हजार्डस रिसर्च जर्नल’ में प्रकाशित एक नए वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार बड़ा खुलासा हुआ है। जिसमें अकेले चमोली जिले में 500 ग्लेशियर झीलों की पहचान की गई है, जो जलवायु परिवर्तन और भूकंपीय गतिविधियों के कारण बेहद संवेदनशील स्थिति में हैं। यह अध्ययन ‘इंसटीट्यूट फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक चेंज’ (ISEC) बेंगलुरु और हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा वर्ष 2000 से 2020 तक के उपग्रह चित्रों, भूमि सतह तापमान और मौसम के ऐतिहासिक डेटा के विश्लेषण के आधार पर किया गया है। अध्ययन में सीधे ग्लेशियर की सतह पर बनने वाली ‘सुप्राग्लेशियल झीलों’ को सबसे खतरनाक माना गया है। ये लगातार अपना आकार बदलती हैं और इनके फटने की संभावना सबसे अधिक होती है।
इतनी झीलें मौजूद
रिपोर्ट्स के मुताबिक अध्ययन में पाई गई 500 झीलों में से अधिकांश अत्यधिक ऊंचाई वाले और दुर्गम क्षेत्रों में स्थित हैं।
• 5,000 से 6,000 मीटर की ऊंचाई पर: 40.92% झीलें मौजूद हैं।
• 4,000 से 5,000 मीटर की ऊंचाई पर: अधिकांश शेष झीलें स्थित हैं।
जानें क्या है GLOF
जब ग्लेशियर पिघलते हैं, तो उनका पानी प्राकृतिक रूप से मिट्टी, पत्थरों और बर्फ के ढेरों (मोरेन/Moraine) के पीछे एकत्र होकर झील बन जाता है। यदि यह प्राकृतिक बांध भूस्खलन, हिमस्खलन, अत्यधिक बारिश या पानी के भारी दबाव के कारण टूट जाता है, तो लाखों घनमीटर पानी चंद मिनटों में नीचे की ओर तबाही मचाता हुआ बह निकलता है। इस विनाशकारी प्राकृतिक घटना को ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) कहा जाता है।