August 13, 2022

माहवारी के दौरान क्यों महिलाओं को है पूजा-पाठ करने की मनाही, जानिये इससे जुड़े सामजिक नियम और वैज्ञानिक तर्क

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माना जाता है कि महिलाओं और लड़कियों को मासिक धर्म के दौरान मंदिर नहीं जाना चाहिए। इस दौरान मंदिर के अलावा कई अन्‍य काम करने की भी लड़कियों को मनाही होती है। दरअसल यह नियम महिलाओं को काम से कुछ वक्‍त आराम देने के लिए बनाए गए हैं।

सभी धर्मों में बनाये गए हैं मासिक धर्म से जुड़े कुछ नियम

वैदिक धर्म के अनुसार मासिक धर्म के दिनों में महिलाओं के लिए सभी धार्मिक कार्य वर्जित हैं। सिर्फ हिन्दू धर्म में ही नहीं, लगभग सभी धर्मों में ऐसे कई दकियानुसी नियम हैं जिनके पीछे छुपे तथ्य को समझना थोडा मुश्किल लगता है। सब लोगों से अलग रहो, आचार को हाथ मत लगाओ, बाल ना संवारो या काजल मत लगाओ जैसी तर्करहित बातें बतायी जाती हैं। 

ये हैं मासिक धर्म के दौरान पूजा और व्रत से जुड़ी  मान्यताएं

*   पीरियड्स के दौरान पूजा-पाठ न करने का कारण ये था कि उस समय पूजा पद्धति मंत्रोच्चार के बिना पूरी नहीं मानी जाती थी। वहीं, पूजा के दौरान बड़े-बड़े अनुष्ठान किए जाते थे, जिसमें बहुत समय और ऊर्जा लगती थी। मंत्रोच्चारण पूरी शुद्धता के साथ किए जाते थे। महिलाओं को होने वाली परेशानियों को देखते हुए उन्हें पूजा में शामिल न होने को कहा जाता था ।

*   यदि आपने कोई व्रत रखा है और आपको बीच में ही पीरियड्स आ जाएं तो भी आपको अपना व्रत पूरा करना चाहिए। पीरियड्स के दौरान भी आपके मन में ईश्वर के प्रति आस्था कम नहीं होती और ईश्वर सिर्फ उस आस्था को ही समझते हैं। भगवान के लिए मन की शुद्धता सबसे ज्यादा जरूरी है, शारीरिक शुद्धता उसके बाद आती है। यदि महिला को नवरात्रि के बीच में मासिक आता है तो चार दिनों तक पूजा नहीं करना चाहिए। पांचवें से महिला पूजा में सम्मिलित हो सकती है। इस दौरान पीरियड से गुजरने वाली महिलाओं को माता का भोग नहीं तैयार करना चाहिए। इस दौरान महिलाओं का पूजा स्थल पर जाना वर्जित होता है।

इसलिए मासिक के दौरान महिलाओं को रखा जाता है अलग

इस दौरान महिलाओं को अन्य लोगों से अलग रहने का नियम है क्योंकि ऐसे में स्त्रियों को अपवित्र माना गया है। उस दौरान वे महिलाएं कहीं बाहर आना-जाना नहीं करती थीं। इस अवस्था में उन्हें एक वस्त्र पहनना होता था, ज़मीन पर सोना होता था और वे अपना खाना आदि कार्य स्वयं ही करती थीं। जब भी महिलाओं को पीरियड्स टाईम आता तो उस वक्त उनमें काफी कमजोरी आ जाती है इसलिए ही महिलाओं को इन दिनो अन्य कार्यो से दूर रखा जाता है। बाहर घूमने-फिरने इसलिए नहीं दिया जाता है क्योकि इस समय में इन्हे बुरी नजर व बुरे प्रभाव जल्द ही लग जाते है।

इस विषय में क्या है वैज्ञानिक मत

वैज्ञानिक मत के अनुसार इस समय महिलाओं को इनफेक्शन का अधिक खतरा रहता है। यही कारण है कि अन्य लोगों को इसके बुरे प्रभाव एवं महिलाओं को संक्रमण से बचाने के लिए उन्हें घर के कामकाज से अलग रखकर आराम करने की बात कही गयी होगी। और समय के साथ इस बात का रूप ही बदल गया होगा।
माहवारी और छूआछूत का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं और एक भी कारण ऐसा नहीं है की मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के साथ अछूतों जैसा व्यवहार हो।  परंपरा के नाम पर अब भी यह चला आ रहा है।

जानें ये कथा

प्राचीन कथाओं के अनुसार मह‌िलाओं के लिए मासिक धर्म का नियम भगवान शिव ने देवी पार्वती के कहने पर बनाया था। साथ ही कुछ नियम भी निर्धारित किए थे, जिनका अनुसरण वो उन दिनों के दौरान कर सकें। मनुस्मृत‌ि और भव‌िष्य पुराण में भी इन नियमों का उल्लेख मिलता है। मासिक धर्म के चौथे दिन महिलाएं स्नान के बाद शुद्ध मानी जाती है । भागवत पुराण की एक कथा के अनुसार एक बार देवराज इंद्र अपनी सभा में बैठे हुए थे। उसी समय देव गुरु बृहस्पति आए। और देवराज इंद्र गुरु बृहस्पति के सम्मान में इंद्र उठ कर खड़े नहीं हुए। इस  बृहस्पति को क्रोध आ गया और उन्होंने  इसे अपना अपमान समझा और देवताओं को छोड़कर अन्यत्र चले गए। देवताओं को विश्वरूप को अपना पुरोहित बना कर काम चलाना पड़ा किन्तु विश्व रूप कभी-कभी देवताओं से छिपा कर असुरों को भी यज्ञ-भाग दे दिया करता था। इंद्र ने उस पर कुपित होकर उसका सिर काट दिया। गुरु की हत्या करना महापाप होता है । इन्द्र ने पाप से पीछा छुड़ाने के लिए भगवान विष्णु का कठोर तप किया। इन्द्र के पाप को चार भागों में बांटा गया जो पेड़, जल, भूमि और स्त्री को दिया गया। महिलाओं को हर माह होने वाला मासिक धर्म उसी पाप का हिस्सा है।

समाज को मासिक चक्र के विषय में जागरूक होने की आवश्यक्ता

ज्ञात हो कि स्त्री का मासिक चक्र और ये मंदिर एक स्त्री की रचनात्मकता को दर्शाता है और ये बताता है की स्त्री ही इस ब्रह्माण्ड की जननी है और हमें उसका सम्मान हर हाल में करना चाहिए। महिलाओं का मासिक धर्म या माहवारी एक सहज वैज्ञानिक और शारीरिक क्रिया है। लेकिन महिलाओं पर लगाई जाने वाली सामाजिक पाबंदियों से ये दिन किसी सजा से कम नहीं है। खासकर किसी त्योहार के समय ऐसा होने पर काफी दिक्कत और शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है। समाज को इस बात को समझना होगा कि मासिक एक सहज वैज्ञानिक और शारीरिक क्रिया है और वह किसी भी हाल में किसी छुआ-छुत का विषय नहीं हैं।