October 19, 2021

अखिल भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 68वीं पुण्यतिथि, विविध क्षेत्रों में रहा योगदान

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अखिल भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 68वीं पुण्यतिथि है। भारत की एकता व अखंडता के लिए भारतीय जनसंघ संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपना बलिदान दिया है, वह कभी भुलाया नहीं जा सकता।

स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में उद्योग और आपूर्ति मंत्री बने-

डाॅ श्यामाप्रसाद मुखर्जी शायद अपने दौर के उन नेताओं में से थे जिन्होंने बहुत कम उम्र में राष्ट्रीय राजनीति में स्थान बना लिया था। मात्र 46 वर्ष की आयु में वह स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में उद्योग और आपूर्ति मंत्री बने थे। कुल 52 साल के छोटे से जीवन में भी डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की उपलब्धियां बहुत अधिक थीं। इसी के साथ, वह अपने दौर में भविष्य की बातों को पहले ही जान सकने वाले ऐसे व्यक्ति भी थे जिसने हमेशा भारत के राष्ट्रीय हितों और उसकी एकता व अखंडता को अपनी राजनीति में सर्वोच्च महत्व दिया। कोलकाता समेत बंगाल के एक हिस्से को पश्चिमी बंगाल के रूप में भारत का अंग बनाए रखना सुनिश्चित करने के लिए उनका महान और युगांतरकारी प्रयास ऐसी महागाथा है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। बंगाली हिंदुओं को भारत के एक हिस्से में सुरक्षा और गरिमा के साथ जीने का अवसर देने के इस प्रयास में उन्हें तत्कालीन बंगाल के सभी बुद्धिजीवियों तथा सभी राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े नेताओं का व्यापक समर्थन मिला था। जदुनाथ सरकार, आरसी मजूमदार, उपेंद्रनाथ बनर्जी, सुनीति कुमार चटर्जी, और राधाकुमुद मुखर्जी जैसे उस युग के दिग्गज विचारकों, इतिहासकारों, बुद्धिजीवियों और सार्वजनिक हस्तियों ने बंगाल के एक हिस्से को भारत में बचाने रखने के लिए श्यामा प्रसाद के प्रयासों को आगे बढ़ कर एक स्वर से समर्थन दिया था।

दिल्ली में एक छोटे से कार्यक्रम से भारतीय जनसंघ की नींव पड़ी और डॉ मुखर्जी उसके पहले अध्यक्ष चुने गये-

वर्ष 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब जवाहरलाल नेहरु देश के प्रधानमंत्री बने तो स्वयं महात्मा गांधी एवं सरदार पटेल ने डॉ मुखर्जी को तत्कालीन मंत्रिपरिषद में शामिल करने की सिफारिश की और नेहरु द्वारा डॉ मुखर्जी को मंत्रिमंडल में लेना पड़ा। डॉ मुखर्जी देश के प्रथम उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बने। लेकिन कुछ साल बाद उन्होंने इस पद से भी इस्तीफ़ा दे दिया। दरअसल लियाकत-नेहरु पैक्ट को वे हिन्दुओं के साथ छलावा मानते थे और इसी बात पर 8 अप्रैल 1950 को उन्होंने केन्द्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया था। नेहरु की नीतियों के विरोध में एक वैकल्पिक राजनीति की कुलबुलाहट डॉ मुखर्जी के मन में हिलोरे मारने लगी थी। गांधी की हत्या के बाद संघ पर लगे प्रतिबन्ध की वजह से देश का एक तबका यह मानने लगा था कि देश की राजनीति में कांग्रेस का विकल्प होना भी जरुरी है। आरएसएस के तत्कालीन सर संघचालक गुरूजी से सलाह करने के बाद 21 अक्तूबर 1951 को दिल्ली में एक छोटे से कार्यक्रम से भारतीय जनसंघ की नींव पड़ी और डॉ मुखर्जी उसके पहले अध्यक्ष चुने गये। 1952 में देश में पहला आम चुनाव हुआ और जनसंघ तीन सीटें जीत पाने में कामयाब रहा। डॉ मुखर्जी भी बंगाल से जीत कर लोकसभा में आये। बेशक उन्हें विपक्ष के नेता का दर्जा नहीं था लेकिन वे सदन में नेहरु की नीतियों पर तीखा चोट करते थे. सदन में बहस के दौरान नेहरु ने एकबार डॉ मुखर्जी की तरफ इशारा करते हुए कहा था, ‘आई विल क्रश जनसंघ’। इसपर डॉ मुखर्जी ने तुरंत जवाब दिया, ‘आई विल क्रश दिस क्रशिंग मेंटालिटी’। शायद एक स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष की मजबूत अवधारणा की नींव तब नहीं रखी जा सकती, अगर डॉ मुखर्जी न होते।

भारत के पुनर्निर्माण के उद्देश्य से उन्होंने जनसंघ की स्थापना की-

मात्र 33 वर्ष की आयु में ही डॉ. मुखर्जी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बनने का सम्मान प्राप्त किया। एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान के विरुद्ध डॉक्टर मुखर्जी ने स्वतंत्र भारत का पहला राष्ट्रवादी आंदोलन छेड़ा था। भारत के पुनर्निर्माण के उद्देश्य से उन्होंने जनसंघ की स्थापना की।