October 16, 2021

अल्मोड़ा: नंदा देवी रामलीला कमेटी ने कर्नाटक खोला रामलीला कमेटी के पदाधिकारियों द्वारा जारी बयान का किया खंडन, कहा पिछले वर्ष नंदादेवी में भी आयोजित हुई थी 3 दिवसीय रामलीला

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श्री नंदा देवी रामलीला कमेटी ने कर्नाटकखोला  पदाधिकारियों के कथन का किया खंडन

श्री नंदा देवी रामलीला कमेटी ने विगत वर्ष प्रशासन से अनुमति लेकर कोरोना गाइडलाइंस का पालन करते हुए तीन दिवसीय रामलीला का सफल मंचन किया गया था। जिसमे दर्शकों ने लाइव के माध्यम से रामलीला का आनंद लिया था। भुवनेश्वर महादेव मंदिर और रामलीला समिति कर्नाटक खोला के पदाधिकारियों का कथन है कि वो ही एकमात्र रामलीला हैं जिसका मंचन हुआ। यह बात सभी समाचार पत्रों और ऑनलाइन वेब न्यूज़ पोर्टल के माध्यम से प्रकाशित भी हुई है और फेसबुक में उक्त कमेटी के एक पदाधिकारी की ID में लाइव प्रसारित भी की गई है जिसमे उक्त पदाधिकारी ये संबोधित करते हुए नज़र आ रहे हैं कि पिछले वर्ष पूरे अल्मोड़ा नगर में उनके वहाँ ही रामलीला का मंचन वर्चुअल माध्यम से और जो दर्शक मंचन देखने आए, उन्होंने सोशल  डिस्टेंसिंग रख कर रामलीला का आंनद लिया। जिसका श्री नंदा देवी रामलीला कमेटी ने उक्त कमेटी के पदाधिकारियों के कथन का खंडन किया है। कोरोना संक्रमण के इस दौर में श्री नंदा देवी रामलीला कमेटी का प्रयास रहेगा कि अगर स्थितियों में सुधार होगा और तो शासन प्रशासन के निर्देशों का अनुपालन करते हुए पूर्व के वर्षों की भांति इस वर्ष भी कोरोना गाइडलाइंस का अनुपालन करते हुए रामलीला का मंचन करने का प्रयास किया जाएगा जिसके लिए शीघ्र बैठक कर निर्णय लिया जाएगा।

जाने अल्मोड़ा रामलीला का इतिहास-

अल्मोड़ा की ऐतिहासिक रामलीला को देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचते है। 1900 से पूर्व अल्मोड़ा की एक मात्र रामलीला बद्रेश्वर में होती थी। 1948 में बद्रेश्वर के रामलीला आयोजन स्थल पर उठे विवाद के कारण यहाँ आयोजित होने वाली रामलीला पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। तब बद्रेश्वर की ही रालीला के कलाकारों द्वारा नंदादेवी मंदिर में रामलीला का आयोजन शुरू किया गया।
जिसको बाद में त्यूनरा तथा उसके बाद नंदा देवी मंदिर परिसर में किया जाने लगा। जो वर्तमान में भी जारी है। 1860 में सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा के बद्रेश्वर में सबसे पहले मंचन किया गया। इसे तत्कालीन डिप्टी कलक्टर स्व. देवीदत्त जोशी ने प्रारंभ किया था। तब वर्षों तक बद्रेश्वर रामलीला का मंचन का केंद्र रहा। बाद में भूमि विवाद के चलते 1950-51 से यह ऐतिहासिक नंदादेवी के प्रांगण में जारी है। पूर्व में बद्रेश्वर में होने वाली रामलीला छिलकों की रोशनी में की जाती थी। बाद में उजाले की व्यवस्था पेट्रोमेक्स से की जाने लगी। वर्तमान में आधुनिक तकनीक का प्रयोग रामलीलाओं में किया जाने लगा है। नगर के विभिन्न स्थानों में भी रामलीला का मंचन वर्षो से होता आया है। इस रामलीला की खासियत है इसका गायन पद्धति पर आधारित होना, जिसमें शास्त्रीय रागों के साथ सभी कलाकार अपने पात्र का गायन खुद ही करते हैं। अल्मोड़ा की रामलीला को कुमाऊं की पहली रामलीला का गौरव प्राप्त है। अल्मोड़ा के रामलीला की मुख्य विशेषता रामलीला का सजीव मंचन है, जिसमें महिलाएं और छोटी उम्र के बच्चें शानदार अभिनय कर ऐसा समां बांधते है कि दर्शक झूमने और ताली बजाने पर मजबूर हो जाते हैं।वर्तमान में नगर के लक्ष्मी भंडार, राजपुरा, कर्नाटक खोला, सरकार की आली, एनटीडी, धारानौला सहित अनेक स्थानों में रामलीला का मंचन होता है।