लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि (स्मृति दिवस) हर साल 1 अगस्त को मनाई जाती है। जिनका प्रारंभिक नाम केशव गंगाधर था, लेकिन लोकमान्य तिलक के नाम से ज्यादा जाने गये। तिलक जी ने अपने संपूर्ण जीवन में देश की आजादी के साथ ही समाज से तमाम कुरीतियां दूर करने के लिए जागरूकता फैलाई। इसके लिए उन्होंने गीता रहस्य के नाम से रचना कर डाली, जिसके जरिए उन्होंने कर्म प्रधानता पर जोर दिया।
किया जाता है याद
इस दिन महान स्वतंत्रता सेनानी को उनके देश के लिए दिए गए महान योगदान और बलिदान के लिए याद किया जाता है। उनका निधन 1 अगस्त 1920 को हुआ था। लोकमान्य तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र प्रांत के रत्नागिरी जिले के गांव चिखली में हुआ था। उनका प्रारंभिक नाम केशव गंगाधर था। अपने तर्क, वाक्य पटुता और सटीक और सर्वमान्य बातों की वजह से वह लोकमान्य कहलाये।
क्रांतिकारियों और सेनानियों के बीच बीता बचपन
लोकमान्य तिलक का जन्म ऐसे काल-खंड में हुआ था, जब देश में स्वतंत्रता के लिये एक बड़ी तैयारी हो रही थी। लोकमान्य तिलक का बचपन और शिक्षण उन परिस्थितियों में पूरा हुआ, जब देश में इस प्रथम सशस्त्र और संगठित क्रांति की असफलता के बाद अंग्रेजों के दमन का दौर चल रहा था। अंग्रेज क्रांति के प्रत्येक सूत्र का क्रूरता से दमन कर रहे थे। क्रांतिकारियों और सशस्त्र संघर्ष के सेनानियों को ढूंढ-ढूंढ कर सामूहिक फांसी दी रही थी, उनकी तलाश में गांव के गांव जलाये जा रहे थे। सामूहिक दमन के इस दृश्य के बीच तिलक ने होश संभाला।
यह स्वाभाविक ही था कि दमन के इन दृश्यों ने उनके मानस में स्वत्व का बोध और दासत्व की विवशता का चित्रण सशक्त हुआ था। इसलिए बाल्यकाल से ही उनके मन में संगठन, संघर्ष और स्वत्वाधिकार की भावना प्रबल होती चली गई। उनके परिवार की पृष्ठभूमि सांस्कृतिक जुड़ाव की रही। इसलिये भारतीय गरिमा की कहानियां उन्हे कंठस्थ थीं। उन्होंने उस समय की प्रचलित आधुनिक शिक्षा की सभी बड़ी डिग्रियां हासिल की, लेकिन उन्होंने कहा था कि अंग्रेजी शिक्षा बड़ों का अनादर सिखाती है और परिवार तोड़ना सिखाती हैं।
पांच महीने में पेंसिल से लिख डाला ‘गीता रहस्य’
अपनी असहमति और अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों पर तिलक जी ने केवल वक्तव्य या सभाओं तक ही सीमित न रखा, उन्होंने आलेख लिखने की भी श्रृंखला चलाई। इन लेखों के कारण उन पर अनेक मुकदमे बने। कई बार सजाये और जुर्माना हुआ, लेकिन 1897 में उन पर देशद्रोह का मुकदमा बना और 6 साल की कैद हुई। अपनी इसी जेल यात्रा में ही तिलक जी ने ‘गीता रहस्य’ नामक ग्रन्थ लिखा, जो आज भी गीता पर एक श्रेष्ठ टीका मानी जाती है। इसके माध्यम से उन्होंने देश को कर्मयोग की प्रेरणा दी। गीतारहस्य को तिलक जी ने महज पांच महीने में पेंसिल से ही लिख डाला था। लेकिन एक दौर में लगता था कि शायद ब्रिटिश हुकूमत उनके लिखे को जब्त ही कर लें। हालांकि उन्हें अपनी याददाश्त पर बहुत भरोसा था। इसलिए उन्होंने कहा था, “डरने का कोई कारण नहीं। अभी बहियां सरकार के पास हैं। लेकिन ग्रंथ का एक-एक शब्द मेरे दिमाग में है। विश्राम के समय अपने बंगले में बैठकर मैं उसे फिर से लिख डालूंगा।”
क्या है गीता रहस्य
गीता रहस्य नामक पुस्तक की रचना लोकमान्य तिलक ने मांडले जेल (बर्मा) में की थी। इसमें उन्होंने श्रीमद्भागवतगीता के कर्मयोग की वृहद व्याख्या की। उन्होंने अपने ग्रन्थ के माध्यम से बताया कि गीता चिन्तन उन लोगों के लिए नहीं है, जो स्वार्थपूर्ण सांसारिक जीवन बिताने के बाद अवकाश के समय खाली बैठ कर पुस्तक पढ़ने लगते हैं। गीता रहस्य में यह दार्शनिकता निहित है कि हमें मुक्ति की ओर दृष्टि रखते हुए सांसारिक कर्तव्य कैसे करने चाहिए। इस ग्रंथ में उन्होंने मनुष्य को उसके संसार में वास्तविक कर्तव्यों का बोध कराया है। दरअसल तिलक मानने को तैयार नहीं थे कि गीता जैसा ग्रन्थ केवल मोक्ष की ओर ले जाता है। उसमें केवल संसार छोड़ देने की अपील है। वह तो कर्म को केंद्र में लाना चाहते थे। वही शायद उस समय की मांग थी, जब देश गुलाम हो, तब आप अपने लोगों से मोक्ष की बात नहीं कर सकते। उन्हें तो कर्म में लगाना होता है। वही तिलक ने किया और गीता के रहस्य को पूरी दुनिया के सामने ले आए। गांधी जी भी गीता के अत्यन्त प्रशंसक थे, उसे वह अपनी माता कहते थे। उन्होंने भी गीतारहस्य को पढ़ कर कहा था कि गीता पर तिलक जी की यह टीका ही उनका शाश्वत स्मारक है।
‘आधुनिक भारत का निर्माता’
तिलक जी ने 1907 में पूर्ण स्वराज्य का नारा दिया। तिलक जी का मानना था कि स्वतन्त्रता भीख की तरह मांगने से नहीं मिलेगी। उन्होंने नारा दिया – स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर ही रहेंगे और 1908 में सशस्त्र क्रांतिकारियों खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाको जैसे आंदोलन कारियों का खुलकर समर्थन किया। यही कारण था बंगाल और पंजाब के क्रांतिकारी समूह तिलक जी से जुड़ गये। तिलक जी 1916 में ऐनी बेसेन्ट द्वारा गठित होमरूल सोसायटी से जुड़े। उनका निधन 1 अगस्त 1920 को मुम्बई में हुआ। तिलक जी का व्यक्तित्व कितना विशाल था। तिलक जी के निधन पर गांधी जी ने कहा था कि ” वे आधुनिक भारत का निर्माता थे”।