डॉ ललित चंद्र जोशी की स्वरचित कविता, जंगल जल रहे हैं
जंगल भस्म हो रहे हैंखाक हो रही हैं-नाना वनस्पतियां, कीट-पतंगेहो रहा है-धुआँ धुआँ यहां वहां जहां तहाँसूख रहे हैं-नौला,धारे,गाड़-गधेरेगांववासी सिर्फ बना रहे हैं सिर्फ अपनी मांगकि लपटें हराम तक न पहुंचेविभाग अचेत हैं और विभागी थके थके सेपर्यावरण संरक्षण को लेकर बनीं संस्थाएंलाइव आ चुकी हैं-एफबी , इंस्टा परजलते हुए…