July 6, 2022

जयंती विशेष: दुनिया में अजय थे गामा पहलवान, पूरी दुनिया में कोई हरा सकने वाला नहीं था रेसलर, जानें कैसे बनें वर्ल्ड चैंपियन

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आज भारत के गामा पहलवान की जयंती है। आज रेसलिंग में बहुत बदलाव हो गये है। लेकिन गामा पहलवान भारी से भारी पत्थरों को उठा सकने की ताक़त रखते थे।

जानें जीवनी-

दतिया के होलीपुरा में गामा का जन्म 22 मई सन् 1889 में हुआ था। हालांकि, उनके जन्म को लेकर विवाद है कुछ यह भी मानते हैं कि उनका जन्म 1880 में पंजाब के अमृतसर में हुआ था। इनके बचपन का नाम ग़ुलाम मुहम्मद था। इन्होंने 10 वर्ष की उम्र में ही पहलवानी शुरू कर दी थी। इनके परिवार में स्वयं ही विश्वप्रसिद्ध पहलवान हुए थे । गामा कि दो पत्नियां थीं ,एक पाकिस्तान में और दूसरी बड़ोदा गुजरात में । जब गामा छः साल के थे, तो उनके पिता मौहम्मद अज़ीज़ बख्श का निधन हो गया । उसके बाद उनके नानाजी नुन पहलवान ने उनका पालन किया । बाद में उनके निधन के बाद उनके मामाजी इड़ा पहलवान ने उनका पालन किया और उनकी ही देखरेख में गामा ने पहलवानी की शिक्षा प्रारंभ की।

100 रोटी और 6 किलो चिकन थी खुराक-

गामा ने पहलवानी की शिक्षा अपने मामा इड़ा पहलवान से प्रारंभ की। आगे चलकर इनके अभ्यास में काफी बदलाव आए। जैसे कि, यूँ तो बाकी पहलवानों कि तरह उनका अभ्यास भी सामान्य ही था,परंतु इस सामान्यता में भी असामान्यता यह थी कि वे प्रत्येक मैच एक से नहीं बल्कि चालिस प्रतिद्वंदीयों के साथ एक-साथ लड़ते थे और उन्हें पराजित भी करते थे । गामा रोज़ तीस से पैंतालीस मिनट में, सौ किलो कि हस्ली पहन कर पाँच हजार बैठक लगाते थे, और उसी हस्ली को पहन कर उतने ही समय में तीन हजार दंड लगाते थे । वे रोज़ डेढ़ पौंड बादाम मिश्रण (बादाम पेस्ट), दस लीटर दूध, मौसमी फलों के तीन टोकरे, आधा लीटर घी, दो देसी मटन, छः देसी चिकन,‌छः पौंड मक्खन, फलों का रस, एवं अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ अपनी रोज़ कि खुराक के रुप में लिया करते थे ।

डंबल की जगह करते थे पत्थरों का इस्तेमाल-

इन्होंने पत्थर के डम्बल से अपनी बॉडी बनाई थी। गामा के बारे में कहा जाता है कि वह 80 किलो वजनी हंसली (कसरत के लिए गले में पहनी जाने वाली पत्थर की भारी वस्तु) पहन कर उठक बैठक लगाते थे।‌डंबल के रूप में भी वह भारी भरकम पत्थर का उपयोग करते थे। आम आदमी के लिए इन्हें उठाना मुश्किल ही है।‌कहा जाता है कि गामा एक बार में एक हजार से अधिक दंड बैठक लगाया करते थे। कई बार बैठक की संख्या पांच हजार तक पहुंच जाती थी।

विश्व भर में प्रसिद्ध-

गामा ने अपने पहलवानी करियर के शुरुआत महज़ 10 वर्ष की आयु से की थी । सन 1888 में जब जोधपुर में भारतवर्ष के बड़े-बड़े नामी-गिरामी पहलवानों को बुलाया जा रहा था, तब उनमें से एक नाम गामा पहलवान का भी था । यह प्रतियोगिता अत्याधिक थकाने वाले व्यायाम की थी । लगभग 450 पहलवानों के बीच 10 वर्ष के गामा पहलवान प्रथम 15 में आए थे । इस पर जोधपुर के महाराज ने उस प्रतियोगिता का विजयी उन्हें ही घोषित किया । बाद में दतिया के महाराज ने उनका पालन पोषण आरंभ किया । सूत्रों के अनुसार, गामा पहलवान ने वर्ष 1902 में बड़ौदा में 1200 किलो का एक पत्थर उठाया था और वह इसको उठा कर कुछ दुरी तक चले भी थे। अब इस पत्थर को बड़ौदा के संग्रहालय में रखा गया है।

वर्ल्ड चैंपियन का खिताब-

5 फुट 7 इंच के औसत हाइट वाले गामा पहलवान ने उस दौर में विश्व के लगभग हर लंबे पहलवान को पटकनी दी थी। महज 19 साल की उम्र में ही गामा पहलवान ने ‘रहीमबख्श सुल्तानी वाला’ जैसे दिग्गज पहलवान को चारों खाने चित कर दिया था। अद्वितीय शक्ति, औज और फुर्ती से रहीमबख्श सुल्तानीवाला पहलवान को हराने के बाद गुलाम मुहम्मद यानी गामा पहलवान का नाम भारत ही नहीं बल्कि विश्व में तेजी से फैल गया। विश्व दंगल में गामा पहलवान ने अमेरिका के पहलवान ‘बैंजामिन रोलर’ और विश्व विजेता पहलवान पोलैण्ड के स्टेनली जिबिस्को को भी धूल चटाई थी। विश्व विजेता पहलवान स्टेनली जिबिस्को के बारे में ऐसा कहा जाता है कि वह गामा पहलवान से ज्यादा वजनी थी। बावजूद इसके वो गामा पहलवान से डरते थे। बताया जाता है कि एक बार तो पोलैंड का यह दिग्गज पहलवान मैदान छोड़कर भाग खड़ा हुआ था। उस समय दुनिया में कुश्ती के मामले में अमेरिका के जैविस्को का बहुत नाम था। गामा ने इसे भी परास्त कर दिया था। पूरी दुनिया में गामा को कोई नहीं हरा सका, और उन्हें वर्ल्ड चैंपियन का ख़िताब मिला।

बीमारी के चलते हुआ निधन-

गामा पहलवान की मृत्यु 23 मई 1960 को लाहौर, पाकिस्तान में हुई । वे काफी समय से बीमार थे ।उनकी बीमारी का सारा खर्चा पाकिस्तान सरकार ने उठाया और उन्हें कुछ जमीनें भी दी थीं ।