उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ शराब की गंध आने से साबित नहीं होगा ‘ड्रंक एंड ड्राइव’ का मामला, मेडिकल टेस्ट जरूरी

नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक अहम कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि किसी चालक के मुंह से केवल शराब की गंध आने मात्र को ‘नशे में वाहन चलाने’ का अहम सबूत नहीं माना जा सकता।

अदालत का फैसला

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जिस पर अदालत ने साफ किया कि ऐसे मामलों में वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट का होना अनिवार्य है। इस संबंध में जस्टिस आलोक मेहरा की एकल पीठ ने एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए सेशनल कोर्ट के आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ब्लड टेस्ट या ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट के जरिए यह साबित होना जरूरी है कि चालक के शरीर में शराब की मात्रा तय सीमा से अधिक थी। ऐसी वैज्ञानिक जांच के अभाव में केवल गंध के आधार पर नशे में वाहन चलाने का आरोप या बीएनएस (BNS) की धारा-105 के तहत मुकदमा तय नहीं किया जा सकता।

​जानें क्या है पूरा मामला

​यह मामला याचिकाकर्ता अमर सिंह से जुड़ा है, जो बदरीनाथ धाम से चमोली की तरफ एक जीप चला रहे थे।‌ सफर के दौरान अचानक वाहन से नियंत्रण खो गया और जीप पलट गई। इस दर्दनाक दुर्घटना में कई यात्री गंभीर रूप से घायल हो गए और एक यात्री की मौत हो गई। इस हादसे के बाद जब चालक का चिकित्सीय परीक्षण किया गया, तो डॉक्टरों ने रिपोर्ट में उसके मुंह से शराब की गंध आने का जिक्र तो किया, लेकिन पुलिस या मेडिकल टीम ने न तो उसका ब्लड सैंपल लिया और न ही ब्रेथ एनालाइजर जांच कराई।


​जानें क्या कहता है मोटर वाहन अधिनियम

​याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि किसी भी व्यक्ति पर नशे में गाड़ी चलाने का आरोप बिना वैज्ञानिक मापदंडों के नहीं लगाया जा सकता। मोटर वाहन अधिनियम-1988 की धारा-185 के मुताबिक, किसी चालक को कानूनी रूप से नशे की हालत में तभी माना जाएगा, जब वैज्ञानिक जांच में उसके प्रति 100 एमएल (ml) रक्त में 30 मिलीग्राम (mg) से अधिक शराब की मात्रा पाई जाए। इस मामले में ऐसा कोई वैज्ञानिक डेटा मौजूद नहीं था, इसलिए कोर्ट ने केवल गंध के आधार पर लगी गंभीर धाराओं को हटाने का आदेश दिया।