August 15, 2022

जंगली माँस के सेवन से बढ़ता है पशुजन्य बीमारियों का जोखिम – यूएन रिपोर्ट

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संयुक्त राष्ट्र ने बुधवार को एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें पशुओं से मनुष्यों में फैलनी वाली बीमारियों के बढ़ते जोखिम के प्रति भी आगाह किया गया है ।
संयुक्त राष्ट्र की एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि जंगली पशुओं के माँस की घरेलू खपत का ऐसी अनेक प्रजातियों पर असर हो रहा है, जिन्हें जंगली जानवरों की प्रवासी प्रजातियों की रक्षा पर संयुक्त राष्ट्र की एक सन्धि (Convention on the Conservation of Migratory Species of Wild Animals / CMS) के तहत संरक्षण प्राप्त है ।

70 फ़ीसदी से अधिक स्तनपायी प्रजातियों का इस्तेमाल जंगली माँस के उपभोग के लिये किया जाता है

अध्ययन के मुताबिक़, CMS सन्धि के अन्तर्गत संरक्षण प्राप्त 70 फ़ीसदी से अधिक स्तनपायी प्रजातियों का इस्तेमाल जंगली माँस के उपभोग के लिये किया जाता है । इस वजह से अनेक प्रवासी स्तनधारी आबादियों में तेज़ गिरावट आई है और कुछ तो विलुप्त भी हो गई हैं ।
यह अपनी तरह की पहली रिपोर्ट है जो दर्शाती है कि जंगली माँस की खपत, क़ानूनी व ग़ैरक़ानूनी ढँग से पशुओं का शिकार किये जाने का एक प्रमुख कारण है ।
बताया गया है कि जिन 105 प्रजातियों का अध्ययन किया गया उनमें से 67 प्रजातियों का शिकार किया जाता है, और ये शिकार, मुख्यतः उनके माँस का उपभोग करने के लिये किया जाता है ।
इन जंगली प्रजातियों के इन जीवों के शिकार की अन्य वजहों में सांस्कृतिक परम्परा, चिकित्सा सम्बन्धी उपयोग, मानव-वन्यजीवन टकराव, शिकार और खेलकूद जैसे कारण शामिल हैं ।

पशुजन्य बीमारियों का जोखिम

रिपोर्ट के मुताबिक़, ठोस तथ्य दर्शाते हैं कि पशुजनित बीमारियों का फैलाव, मानव गतिविधियों से जुड़ा हुआ मामला है । अनेक विशेषज्ञों ने कोविड-19 वैश्विक महामारी के दौरान भी इस सम्बन्ध को रेखांकित किया है । बताया गया है कि जंगली माँस का इस्तेमाल और उसकी खपत, मन्कीपॉक्स वायरस, सार्स (SARS), सूडान इबोला वायरस, ज़ायर इबोला वायरस के मनुष्यों तक पहुँचने की सीधी वजह बताई गई है ।इसके बाद ये बीमारियाँ एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल गईं । अध्ययन के अनुसार 105 प्रवासी प्रजातियों में अब तक, 60 पशुजन्य वायरसों के मौजूद होने की पहचान हो चुकी है । बुनियादी ढाँचे के निर्माण और आर्थिक गतिविधियों की वजह से वन्यजीव पर्यावासों का अतिक्रमण हुआ है और जंगली माँस ग्रहण करने के लिये नए इलाक़ों तक पहुँच बढ़ रही है ।
मगर इसके साथ ही मनुष्यों के लिये जोखिम भी बढ़ रहे हैं ।

प्रकृति के अत्यधिक दोहन की एक भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की कार्यकारी निदेशक इन्गर एण्डरसन ने बताया कि कोविड-19 महामारी ने सिखाया है कि प्रकृति के अत्यधिक दोहन की एक भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है । उन्होंने कहा कि हमें कामकाज के मौजूदा ढर्रे से अलग हटने की सख़्त ज़रूरत है । ऐसा करते समय, हम अनेक प्रजातियों को विलुप्त होने के कगार पर पहुँचने से बचा सकते हैं और पशुजन्य बीमारियों के भविष्य में फैलाव से अपनी रक्षा कर सकते हैं ।