February 6, 2023

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अल्मोड़ा: कार्यशाला का द्वितीय दिवस आजादी के अमृत महोत्सव को समर्पित रहा

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आजादी के अमृत महोत्सव के तहत योग विज्ञान विभाग, सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय एवं नमामि गङ्गे के संयुक्त तत्वाधान में ‘योग साधना पद्धतियों का आधात्मिक-वैज्ञानिक आधार एवं चिकित्सकीय महत्व विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला के द्वितीय दिवस का प्रथम सत्र आजादी के अमृत महोत्सव को समर्पित रहा। आजादी के अमृत महोत्सव पर प्रकाश डालते हुए कार्यशाला के संयोजक एवं योग विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ नवीन भट्ट ने कहा कि आजादी में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले क्रांतिकारी योगी ही थे।

योग द्वारा राष्ट्रीय भावना का विकास होता है

डॉ भट्ट ने आजादी में उनके योगदान को बताते हुए कहा कि गीता में श्रीकृष्ण ने योग को योगः कर्मसु कौशलम कहा है। क्रांतिकारियों द्वारा तत्कालीन परिस्थितियों में भारत माता की आजादी के लिए अपने कर्मों को कुशलता पूर्वक सम्पादित किया इसलिए डॉ भट्ट ने इन सभी क्रांतिकारियों को योगियों की संज्ञा देते हुए कहा कि योग द्वारा राष्ट्रीय भावना का विकास होता है। व्यक्ति शारीरिक, मानसिक, सामाजिक व आध्यात्मिक रूप से परिपक्व होते हुए समाज एवं राष्ट्र के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन करता है। उन्होंने बताया कि यह कार्यशाला आजादी के अमृत महोत्सव के तहत ही आयोजित की जा रही है।

प्राणायाम के अभ्यास से शारीरिक एवं मानसिक व्याधियों का नाश होता है

द्वितीय सत्र में गिरीश अधिकारी ने प्राणायाम एवं सूर्य नमस्कार के वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक महत्व को उजागर करते हुए कहा कि प्राणायाम के अभ्यास से शारीरिक एवं मानसिक व्याधियों का नाश होता है साथ ही इसके अभ्यास से प्रत्याहार की स्थित तक पहुचां जा सकता है। प्राणायाम करने से हम हमारे मस्तिष्क से संबंधित सभी व्याधिओं को मिटाने में सक्षम बनते हैं। यह मन को शांति प्रदान करना है। जो हमारे मनो स्थिति के लिये भी लाभदायक है। प्राण के नियंत्रण से मन भी नियंत्रित होता है क्योंकि प्राण शरीर व मन के बीच की कड़ी है।

20 मिनट तक  ध्यान का अभ्यास कराया गया

प्राणायाम से चित्त की शुद्धि होती है और चित्त शुद्ध होने से अनेक तर्कों, जिज्ञासुओं का समाधान स्वयमेव हो जाता है।इसके पश्चात तृतीय सत्र में मोनिका बंसल ने  ध्यान योग विषय पर व्याख्यान दिया। जिसमें ध्यान का  सार्वभौमिक महत्व व समग्र स्वास्थ्य पर महत्व की चर्चा की गई। जिसमें ध्यान का अर्थ, परिभाषा व ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला गया । 20 मिनट तक  ध्यान का अभ्यास कराया गया। ध्यान स्वयं को जानने की प्रक्रिया है। स्वयं को बाहर से भीतर ले जाने का एक साधन है अपने भीतर के अंतर जगत की यात्रा कराता है ध्यान।

ध्यान का उद्देश्य मन में व्याप्त सभी कषाय- कल्मषो का नाश करना है

ध्यान का उद्देश्य मन में व्याप्त सभी कषाय- कल्मषो का नाश करना है ।तथा व्यक्ति को उसके अंतरजगत की यात्रा कराने के साथ- साथ उसमे समग्र स्वास्थ्य के सभी आयामों को विकसित करना है। वर्तमान के अभ्यास से व्यक्ति के व्यक्तित्व में बड़े बदलाव आने शुरू होते हैं ,जिसका प्रभाव वह अपने व्यक्तित्व में साक्षात अनुभव कर सकते है । योग शास्त्र अनुसार ध्यान के अभ्यास से मानवी काया में चमत्कृत परिणाम देखने को मिलते हैं । व्यक्ति अपनी जीवनचर्या को संयमित करने में सक्षम हो जाता है । चतुर्थ सत्र में विद्या नेगी ने मौन साधना का प्रयोगात्मक सत्र आयोजित किया गया तथा मौन का व्यवहारिक पक्ष उजागर किया तथा प्रतिभागियों को मौन की विधियों तथा उसके आध्यात्मिक पक्ष को अवगत कराया गया। पंचम सत्र में विश्ववजीत वर्मा ने ध्यान योग के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक महत्व एवं उसके चिकित्सकीय अनुप्रयोगों को प्रतिभागियों को बताया गया। उन्होंने कहा कि ध्यान पुनर्निर्देशित करने, इच्छाशक्ति बढ़ाने, भावनाओं और आवेगों को नियंत्रित करने  में सहायता करता है।

ये रहे मौजूद

इस अवसर पर लल्लन कुमार सिंह,रजनीश जोशी, विश्वजीत वर्मा,गिरीश अधिकारी, विद्या नेगी, चन्दन लटवाल, चन्दन बिष्ट, अमितेश, संगीता, दीपिका पुनेठा, स्वेता पुनेठा,भावेश पांडे, दिग्विजय,पारस सहित 200 से अधिक प्रतिभागी मौजूद रहे।