January 24, 2022

गलवान घाटी में भारत के 20 जवानों की शहादत का एक साल हुआ पूरा, आर्मी चीफ़ ने दी श्रद्धांजलि

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चीनी सैनिकों के साथ लद्दाख के पास गलवान घाटी में बीते साल हुई हिंसक झड़प में शहीद हुए 20 सैनिकों को आर्मी चीफ एम.एम. नरवाणे ने श्रद्धांजलि दी है। उनके अलावा सेना के कई अन्य वरिष्ठ अफसरों ने जांबाज सैनिकों की शहादत को स्मरण किया।
भारत-चीन सीमा पर गलवान घाटी के हिंसक संघर्ष में 20 जवानों की शहादत का एक साल पूरा हो गया। पिछले साल 15/16 जून की रात को गलवान घाटी में हुए हिंसक संघर्ष ने 45 साल में ऐसा इतिहास लिख दिया, जिसमें दोनों देशों के सैनिक मारे गए थे। इस रात भारत के वीर जवानों ने उन चीनी सैनिकों का मुकाबला किया था, जो भारत में घुसपैठ करने के लिए बेताब थे।

20 जवानों ने गंवा दी अपनी जान

चीन के सैनिकों के साथ हुई झड़प में कर्नल संतोष बाबू समेत 19 जवानों ने अपनी जान गंवा दी, लेकिन उन्हें भारतीय सीमा में घुसने नहीं दिया। इस पूरे एक साल में भारतीय रक्षा बलों ने खुद को लद्दाख सेक्टर में इस कदर मजबूत कर लिया है कि चीन के किसी भी दुस्साहस का जवाब देने के लिए हर समय तैयार हैं।

तीन दौर में हुआ युद्ध

भारत और चीन के बीच गलवान घाटी का यह हिंसक संघर्ष तीन दौर में हुआ था। 15 जून की शाम 7 बजे से शुरू हुए खूनी संघर्ष का पहला दौर रात 09 बजे तक चला तथा दूसरा दौर 11 बजे तक चला। तीसरा दौर रात 11 बजे शुरू हुआ जो 16 जून की तड़के पांच बजे तक चला था। शहीद हुए 20 वीरों के नाम राष्ट्रीय युद्ध स्मारक के लाल पत्थरों में अंकित किए गए हैं।

वीर चक्र दिया गया

शहीद हुए जवानों की टीम का नेतृत्व करने वाले कर्नल संतोष बाबू को बीते गणतंत्र दिवस पर देश के दूसरे सर्वोच्च युद्ध वीरता पुरस्कार ‘महावीर चक्र’ से नवाजा गया। चीन के सैनिकों से मुकाबला करने वाले चार और बहादुरों को मरणोपरांत ‘वीर चक्र’ दिया गया है, जिनमें बिहार रेजिमेंट के नायब सूबेदार नंदू राम सोरेन, नायब सूबेदार दीपक सिंह, 81 फील्ड रेजिमेंट के हवलदार के. पलानी और पंजाब रेजिमेंट के सिपाही गुरतेज सिंह शामिल हैं। इसके अलावा बहादुरी से लड़कर घायल होने वाले हवलदार तेजेंदर सिंह को भी वीर चक्र दिया गया है।

भारत ने बनाई सड़क

इस घटना के बाद दोनों पक्षों के सैनिक 1.5 कि.मी. पीछे हटे हैं, जिसके बाद यह क्षेत्र बफर जोन में बदल गया है।  चीन के तमाम विरोधों के बावजूद भारत ने पूर्वी लद्दाख में लेह और काराकोरम के बीच 255 किलोमीटर लम्बी रणनीतिक ऑल-वेदर रोड का निर्माण पूरा कर लिया है। दरअसल, दुरबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी (डीएसडीबीओ) रोड के बनने की वजह से नाराज होकर चीन ने गलवान में भारतीय सैनिकों के साथ खूनी भिड़ंत की थी। अब इस मार्ग के बन जाने से केवल गलवान घाटी तक ही नहीं बल्कि उत्तरी क्षेत्रों में भी भारत की पहुंच आसान हो गई है।

भारत ने मजबूत किया बुनियादी ढांचा

भारतीय रक्षा बलों ने कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए बुनियादी ढांचे का निर्माण करके पूरे लद्दाख क्षेत्र में खुद को मजबूत किया है। भारत ने बुनियादी ढांचे की दृष्टि से सभी अग्रिम स्थानों तक सड़क संपर्क में सुधार किया है। सेना के इंजीनियरों ने समय से पहले सभी अग्रिम स्थानों के लिए सड़क संपर्क भी उपलब्ध करा दिया है। भारत एलएसी के साथ सभी क्षेत्रों में सड़क के बुनियादी ढांचे को विकसित करने के लिए काम कर रहा है। भारत ने एलएसी से सटे निम्मू-पदम-दारचा रोड पर काम तेज कर दिया है, जिससे साल भर देश के अन्य हिस्सों से सैनिकों को लद्दाख जाने में आसानी होगी।

सीमा की अग्रिम चौकियों तक सड़कों की कनेक्टिविटी

सीमा सड़क संगठन ने जोजिला दर्रा से लेकर दुनिया की नई सबसे ऊंची मोटर योग्य सड़क उमलिंग ला, मार्समिक ला, खारदुंग ला तक ऐसी सड़कें तैयार की हैं, जिनकी वजह से साल भर सैनिकों की आवाजाही हो सकेगी। अब भारत ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) तक पहुंचने के लिए 17 हजार 800 मीटर की ऊंचाई पर वैकल्पिक मार्ग तैयार कर लिया है।