October 22, 2021

विश्‍व जनसंख्‍या दिवस 2021: शहरों पर बढ़ता दबाव एक बड़ी समस्या

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विश्व जनसंख्या दिवस को मनाने का उद्देश्‍य केवल जनसंख्‍या के प्रति लोगों को जागरूक करना मात्र नहीं है, बल्कि ऐसे लोग जो जरूरी सुविधाओं से वंचित हैं, ऐसे लोग जिनके स्वास्थ्‍य, शिक्षा और जीविका पर ध्‍यान देने की जरूरत है, उनके लिए कुछ करने की चाह को भी बल देना है।  इस दिवस को मनाने का उद्देश्‍य लोगों को अनियंत्रित ढंग से बढ़ने वाली जनसंख्‍या के परिणामों के प्रति जागरूक करना है। इसमें कोई शक नहीं, कि कम जनसंख्‍या घनत्व वाले क्षेत्रों का विकास ज्‍यादा तेजी से होता है, कम जनसंख्‍या वाले क्षेत्रों में बीमारी कम फैलती है और कम जनसंख्‍या घनत्व वाले क्षेत्रों में भोजन, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्‍य जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना आसान होता है।  

1987 को विश्‍व जनसंख्‍या दिवस मनाने का निर्णय लिया

संयुक्त राष्‍ट्र ने पहली बार 11 जुलाई 1987 को विश्‍व जनसंख्‍या दिवस मनाने का निर्णय लिया और उसके ठीक दो वर्ष बाद यानी 11 जुलाई 1989 को पहला विश्‍व जनसंख्‍या दिवस मनाया गया। अगर दुनिया की आबादी की बात करें तो 1804 में दुनिया की जनसंख्‍या 1 बिलियन यानी 100 करोड़ हुई। 1927 में दो बिलियन, 1960 में 3 बिलियन, 2000 में 6 बिलियन। यानी महज 40 वर्ष में दुनिया की आबादी दुगनी हो गई। वहीं 24 अप्रैल 2017 को विश्‍व की जनसंख्‍या 7.5 बिलियन हो गई।

विश्व जनसंख्या दिवस 2021 की थीम

विश्व जनसंख्या दिवस 2021 की थीम है ‘अधिकार और विकल्प उत्तर है, चाहें बेबी बूम हो या बस्ट, प्रजनन दर में बदलाव का समाधान सभी लोगों के प्रजनन स्वास्थ्य और अधिकारों को प्राथमिकता देना है।’

कोविड का यौन व प्रजनन स्वास्थ्य पर गहरा असर

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) ने कहा है कि  कुछ महिलाओं के लिये, ये दौर मातृत्व को टाल देने के लिये मजबूर होने का रहा है, जबकि कुछ अन्य के लिये, स्वास्थ्य सेवाओं में बाधा उत्पन्न होने के कारण, अनचाहा गर्भधारण करना पड़ा है ।
यूएन जनसंख्या कोष की कार्यकारी निदेशिक डॉक्टर नतालिया कनेम ने 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस के अवसर पर एक वक्तव्य जारी किया है… 
हालाँकि, प्रजनन पर कोविड-19 के प्रभाव की पूर्ण तस्वीर अभी हासिल किया जाना बाक़ी है, लेकिन इस तरह के रुझानों ने बड़ी संख्या में बच्चे पैदा होने या फिर कुछ के इस सुख से वंचित होने पर, बड़ी चिन्ताओं को जन्म दिया है ।
जो सबसे बड़ी चिन्ता की बात होनी चाहिये वो ये कि जब महिलाओं को अपने यौन व प्रजनन अधिकारों और अपनी पसन्द चुनने का मौक़ा नहीं मिलता, चाहें उसके लिये स्वास्थ्य सेवाओं में बाधा उत्पन्न होना ज़िम्मेदार हो, या फिर लैंगिक भेदभाव उन्हें अपनी तरह के विकल्प चुनने से रोकता हो, गर्भनिरोधक इस्तेमाल करने या नहीं करने की बात हो या फिर अपने साथी के साथ यौन सम्बन्ध बनाने के बारे में फ़ैसला करने की बात हो ।
स्वस्थ और उत्पादक समाजों के निर्माण के लिये रास्ता तब निकलता है जब महिलाओं को अपने यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के बारे में अपनी पसन्द के फ़ैसले करने का अधिकार हो, और उन्हें अपने फ़ैसलों को सहारा देने के लिये समुचित स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता हासिल हो ।
जिस महिला को अपने शरीर के बारे में ख़ुद फ़ैसला करने का हक़ हासिल होता है तो वो ना केवल स्वायत्ता के मामले में बढ़त हासिल करती है बल्कि स्वास्थ्य और शिक्षा, आय व सुरक्षा क्षेत्रों में आगे बढ़ती है ।ऐसा करने से बहुत सम्भावना है कि ऐसा करने से वो बहुत ख़ुश रहेगी, प्रगति करेगी और उसके साथ-साथ उसका परिवार भी ।
कोविड-19 ने देशों के भीतर और उनके बीच, स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों में मौजूद गहरी विषमताएँ और कमज़ोरियाँ उजागर कर दी हैं ।

1947 के भारत और आज के भारत में कितना अंतर

स्‍वतंत्रता मिलने के बाद एक देश के रूप में भारत ने पिछले 72 वर्षो में चहुमुखी विकास किया है। 1947 के भारत और 2020 के भारत में जमीन आसमान का अंतर है। अनाज और अन्‍य जकिसी भी तरह की देरी किये जाने से महिलाओं और लड़कियों के स्वास्थ्य और जीवन बेहतरी पर बुरा असर पड़ेगा जिसके गम्भीर परिणाम जीवन पर्यन्त चल सकते हैं ।रूरी वस्‍तुओं के उत्‍पादन में आज भारत आत्‍मनिर्भर है। जीडीपी में भी अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी के बाद भारत का नम्‍बर 5वां है। जबकि वैश्‍विक जीडीपी में भारत का हिस्‍सा 8 प्रतिशत है और इसका स्‍थान चीन (19 प्रतिशत) और अमेरिका (15 प्रतिशत) के बाद तीसरा है।

भारत की जनसंख्‍या, आजादी के बाद से इसमें करीब 100 करोड़ की बढ़ोतरी

भारत की जनसंख्‍या इस समय लगभग 135 करोड़ है। आजादी के बाद से इसमें करीब 100 करोड़ की बढ़ोतरी हुई है। जबकि जमीन वही है। देश के क्षेत्रफल में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। जनसंख्‍या की दृष्टि से चीन के बाद भारत का दूसरा नंबर आता है। जबकि क्षेत्रफल की दृष्टि से इसका नम्‍बर रूस, कनाडा, अमेरिका, चीन और आस्‍ट्रेलिया के बाद 7वां है। भारत की जनसंख्‍या यूरोप के सारे देशों की जनसंख्‍या से अधिक है।
देश की राजधानी दिल्‍ली की जनसंख्‍या लगभग 1.30 करोड़ है। अगर राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की बात करें, जिसमें गाजियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद और गुड़गांव भी शामिल हैं, तो यह संख्‍या 2 करोड़ से ऊपर पहुंच जाती है। आज सब अच्‍छा खा रहे हैं। भरपेट खा रहे हैं। अच्‍छा पहन रहे हैं। नई से नई सुविधाएं पा रहे हैं।

शहरों पर बढ़ रहा दबाव, कारण

शहरों पर जनसंख्‍या का दबाव बढ़ने का सबसे बड़ा कारण माइग्रेशन यानी पलायन रहा है। यही कारण है कि शहरों की आबादी गांवों की तुलना में बहुत अधिक है। आबादी का घनत्व भी कई गुना ज्यादा है। सबसे अहम बात यह है कि शहरों में अधिक लोग आ जाने से की वजह से कई शहरों की व्‍यवस्‍था चरमरा जाती है। भोजन, आवास, पेयजल, शिक्षा, परिवहन तथा स्‍वास्‍थ्‍य जैसी सुविधाएं कम पड़ जाती हैं। शहरों में भीड़ बढ़ जाने से यहां के पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगता है, जैसा कि हम दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, मुंबई की हवा में बढ़ते वायु प्रदूषण के रूप में देख भी रही हैं। 
अब अगर छोटे विकसित देशों की बात करें तो आप पाएंगे कि इन देशों की जीवन शैली बेहतर होने का सबसे बड़ा कारण इनकी सीमित जनसंख्‍या है। यूरोप के कुछ बड़े देशों की कुल जनसंख्‍या हमारे बड़े शहरों से भी कम है। स्‍वीडन जिसका क्षेत्रफल 4 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक है जबकि की कुल जनसंख्‍या लगभग 1 करोड़ है। हंगरी की 96 लाख है। स्विटजरलैंड की 86 लाख है। बुल्‍गारिया की 69 लाख है। डेनमार्क की 58 लाख है। नार्वे की 54 लाख है। न्‍यूजीलैंड की 48 लाख है। जबकि हमारे देश के शहर दिल्‍ली – 1.30 करोड़ (राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र – लगभग 2 करोड़), मुम्‍बई – 1.40 करोड़, बेंगंलूरू – 50 लाख,  और कोलकाता की आबादी लगभग 48 लाख है।