December 3, 2022

नैनीताल: विधानसभा से बर्खास्त कर्मचारियों को झटका, हाई कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष के निलंबन आदेश को सही माना

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नैनीताल: उत्तराखण्ड हाई कोर्ट ने विधान सभा सचिवालय से बर्खास्त कर्मचारियों को एकलपीठ द्वारा बहाल किए जाने के आदेश को चुनौती दिए जाने वाली विधानसभा द्वारा दायर विशेष अपीलों पर सुनवाई की। मामले को सुनने के बाद मुख्य न्यायधीश विपिन सांघी व न्यायमुर्ति आरसी खुल्बे की खण्डपीठ ने एकलपीठ के आदेश को निरस्त करते हुए विधान सभा द्वारा पारित आदेश को सही ठहराया है।

संविधान के अनुच्छेद 14 का पूर्ण रूप से किया है उल्लंघन

कोर्ट ने कहा कि बर्खास्तगी के आदेश को स्टे नही किया जा सकता। विधानसभा सचिवालय की तरफ से कहा गया कि इनकी नियुक्ति काम चलाऊ व्यवस्था के लिए की गई थी। शर्तों के मुताबिक इनकी सेवाएं कभी भी समाप्त की जा सकती है बिना किसी कारण वे नोटिस के। इनकी नियुक्तियां विधान सभा सेवा नियमावली के विरुद्ध जाकर की गई है। कर्मचारियों की ओर से कहा गया कि उनको बर्खास्त करते समय अध्यक्ष द्वारा संविधान के अनुच्छेद 14 का पूर्ण रूप से उलंघन किया है।

2000 से 2015 के बीच में भी हुई नियुक्तियों को किया जा चुका है नियमित

अध्यक्ष द्वारा 2016 से 21 तक के कर्मचारियों को ही बर्खास्त किया है जबकि ऐसी ही नियुक्तियाँ विधान सभा सचिवालय में 2000 से 2015 के बीच में भी हुई है जिनको नियमित भी किया जा चुका है। यह नियम तो सब पर एक समान लागू होना था। उन्हीं को बर्खास्त क्यों किया। उमा देवी बनाम कर्नाटक राज्य का निर्णय उन पर लागू नहीं होता क्योंकि यह वहाँ लागू होता है जहां पद खाली नहीं हो और बैकडोर नियुक्तियां की गई हो। यहाँ पद खाली थे तभी नियुक्तां हुई।

विधानसभा अध्यक्ष के द्वारा लोकहित को देखते हुए उनकी सेवाएं 27, 28 ,व 29 सितम्बर को कर दी गई समाप्त

अपनी बर्खास्तगी के आदेश को बबिता भंडारी, भूपेंद्र सिंह बिष्ठ व कुलदीप सिंह व 102 अन्य ने एकलपीठ ने चुनोती दी थी । याचिकाओ में कहा गया था कि विधानसभा अध्यक्ष के द्वारा लोकहित को देखते हुए उनकी सेवाएं 27, 28 ,व 29 सितम्बर को समाप्त कर दी । बर्खास्तगी आदेश मे उन्हें किस आधार पर किस कारण की वजह से हटाया गया कहीं इसका उल्लेख नही किया गया न ही उन्हें सुना गया । जबकि उनके द्वारा सचिवालय में नियमित कर्मचारियों की भांति कार्य किया है। एक साथ इतने कर्मचारियों को बर्खास्त करना लोकहित नही है। यह आदेश विधि विरुद्ध है। विधान सभा सचिवालय में 396 पदों पर बैक डोर नियुक्तियां 2002 से 2015 के बीच में भी हुई है जिनको नियमित किया जा चुका है। परन्तु उनको किस आधार पर बर्खास्त किया गया।

कमेटी द्वारा उनके सभी शैक्षणिक प्रमाण पत्रों की जाँच हुई जो वैध पाई गई

याचिका में कहा गया है कि 2014 तक हुई तदर्थ रूप से नियुक्त कर्मचारियों को चार वर्ष से कम की सेवा में नियमित नियुक्ति दे दी गई । किन्तु उन्हें 6 वर्ष के बाद भी स्थायी नहीं किया अब उन्हें हटा दिया गया। पूर्व में भी उनकी नियुक्ति को 2018 में जनहित याचिका दायर कर चुनौती दी गयी थी जिसमें कोर्ट ने उनके हित में आदेश देकर माना था कि उनकी नियुक्ति वैध है। उसके बाद एक कमेटी द्वारा उनके सभी शैक्षणिक प्रमाण पत्रों की जाँच हुई जो वैध पाई गई।जबकि नियमानुसार छः माह की नियमित सेवा करने के बाद उन्हें नियमित किया जाना था। विधान सभा सचिवालय का पक्ष रखते हुए। अधिवक्ता विजय भट्ट द्वारा कहा गया कि इनकी नियुक्ति बैकडोर के माध्यम से हुई है और इन्हें काम चलाऊ व्यवस्था के आधार पर रखा गया था उसी के आधार पर इन्हें हटा दिया गया।